काशी में देवी अहिल्या द्वारा बनाए गए मणिकर्णिका महाश्मशान घाट को तोड़े जाने का विरोध तेज हो गया है। इस घाट पर लगी देवी अहिल्या की प्रतिमा भी तोड़ दी गई है। इससे होलकर राजपरिवार भी नाराज हैं। इस मामले को लेकर प्रिंस रिचर्ड होलकर ने कहा कि विकास के नाम पर घाट तोड़े जाने में बरती गई लापरवाही की जांच होना चाहिए और तोड़ी गई देवी अहिल्या व शिव प्रतिमा को खासगी ट्रस्ट को सौंपा जाना चाहिए।
किस लिए तोड़ी गई प्रतिमा?
दरअसल, काशी में घाट के पुनर्विकास के नाम पर कार्यदायी संस्था के ठेकेदार ने पत्थरों को तोड़ना शुरू कर दिया। उन्हें तोड़ने के लिए भी पोकलेन की मदद ली गई। पोकलेन ने घाट तोड़ने के दौरान मूर्तियों को भी नहीं देखा और मूर्तियां तोड़कर उसे भी मलबे में दबा दिया।
देवी अहिल्या का बनारस से नाता
बताया जा रहा है कि जब देवी अहिल्या ने घाट का निर्माण कराया था तो उन्होंने गंगा नदी के सामने शिवलिंग की पूजा करते हुए अपनी मूर्तियां भी घाट पर बनवाई थीं, जो अब टूट चुकी हैं। इसे लेकर इंदौर का धनगर समाज व अन्य समाज जल्दी ही आंदोलन करने वाले है।
खासगी ट्रस्ट ने लिखा पत्र
मणिकर्णिका घाट को तोड़े जाने की घटना पर खासगी ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रिंस रिचर्ड होलकर ने कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए काशी प्रशासन को औपचारिक पत्र प्रेषित किया है। पत्र में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस ऐतिहासिक घाट का निर्माण लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर ने सन 1791 में कराया था, जो केवल स्थापत्य नहीं बल्कि सनातन आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। ऐसे प्राचीन और पवित्र घाट का संरक्षण किया जाना चाहिए था, किंतु इसके विपरीत उसे तोड़ दिया गया, जो अत्यंत निंदनीय है।
प्रिंस रिचर्ड होलकर ने प्रशासन से मलबे में दबी देवी अहिल्याबाई होलकर एवं शिव की प्रतिमाओं को तत्काल सुरक्षित रूप से निकालकर खासगी ट्रस्ट को सौंपने की ठोस मांग की है। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट स्वयं इन प्रतिमाओं को पुनः विधिवत स्थापित कराएगा, ताकि देवी अहिल्याबाई की पवित्र गंगा की ओर नतमस्तक प्रतिमा के दर्शन पुनः तीर्थयात्रियों को हो सकें और ऐतिहासिक अन्याय का कुछ हद तक प्रायश्चित किया जा सके।
उन्होंने यह भी मांग की कि घाट तोड़े जाने की प्रक्रिया में बरती गई लापरवाही, मशीनों के अंधाधुंध प्रयोग और मूर्तियों के विध्वंस की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी ऐतिहासिक धरोहर के साथ ऐसा व्यवहार न हो। घटना के विरोध में खासगी ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रिंस रिचर्ड होलकर ने काशी प्रशासन को पत्र लिखकर घाट तोड़े जाने की कड़ी निंदा की है और मलबे में दबी प्रतिमाओं को ट्रस्ट को सौंपने की मांग की है, ताकि उन्हें पुनः विधिवत स्थापित किया जा सके। उन्होंने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की भी मांग की है।
इतिहास साक्षी है कि देवी अहिल्याबाई होलकर ने काशी, महेश्वर, गया, सोमनाथ सहित देशभर में मंदिरों, घाटों और तीर्थों का निर्माण केवल स्थापत्य के लिए नहीं, बल्कि संस्कृति, श्रद्धा और सनातन चेतना के संरक्षण के लिए कराया था। ऐसे में मणिकर्णिका घाट को मशीनों और पोकलेन से तोड़ देना केवल पत्थरों का टूटना नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और स्मृति का विध्वंस है।
महेश्वर के नागरिकों में गुस्सा
इतिहासविद् एवं समाजसेवी जितेंद्र नेगी ने कहा कि मणिकर्णिका घाट केवल एक संरचना नहीं, वह सनातन दर्शन का जीवंत प्रतीक है। विकास के नाम पर उसे तोड़ना यह दर्शाता है कि हम अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। महेश्वर की महिला सामाजिक कार्यकर्ता,कवयित्री स्वाति सिंह राठौर ने कहा कि देवी अहिल्याबाई ने जो निर्माण कराया, वह सत्ता नहीं सेवा का प्रतीक था। आज उन्हीं की प्रतिमा को तोड़ देना हमारी सांस्कृतिक संवेदनहीनता को उजागर करता है। उधर समाजसेवी खेमराज चौहान महेश्वर ने कहा कि काशी में जहाँ हर चिता जीवन की नश्वरता का संदेश देती है, वहीं उसी घाट को तोड़ देना यह सिद्ध करता है कि आधुनिक मनुष्य स्वयं अपने अस्तित्व को मिटाने में लगा है।”
धार्मिक विचारक, डॉ मोहनलाल गुप्ता महेश्वर ने कहा कि विलासिता अपनी जगह हो सकती है, परंतु पौराणिकता और इतिहास को क्षति पहुँचाना सभ्यता की आत्महत्या के समान है। नश्वरता का संदेश देने वाला घाट, स्वयं विनाश का शिकार हो रहा है,मणिकर्णिका घाट वह स्थल है जहाँ अग्नि साक्षी बनकर मनुष्य को यह बोध कराती है कि सब नश्वर है। किंतु आज विडंबना यह है कि वही घाट, जो जीवन के अहंकार को भस्म करने का संदेश देता है, प्रशासनिक लापरवाही और अविवेकपूर्ण विकास का शिकार हो गया। उन्होंने कहा कि यह प्रश्न अब केवल वाराणसी का नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक आत्मा का है—क्या विकास की दौड़ में हम अपनी पहचान, इतिहास और विरासत को कुचलते चले जाएंगे?