नौ दिनों तक देवी आराधना के बाद दसवें दिन दशहरे पर शस्त्रों के पूजन के परंपरा का प्राचीन इतिहास है। देश की आजादी के बाद राजशाही नहीं है, पर राजे-रजवाड़ों के परिवारों द्वारा दशहरा पूजन की परंपरा आज भी जारी है। इतना ही नहीं सरकारी स्तर पर भी पुलिस व अन्य रक्षा बलों में शस्त्र पूजन की परंपरा है। इंदौर में राजवाड़ा के निर्माण के बाद होलकर रियासत के भव्य दशहरा समारोह यहीं से आरंभ होते थे। कुछ समय तक ये समीप स्थित शिवविलास पैलेस में भी हुए थे।
राजवाड़ा मुख्य केंद्र
सूबेदार मल्हारराव होलकर (कार्यकाल- 1731-1765) द्वारा राजवाड़ा के निर्माण का श्रीगणेश किया गया था। यह मल्हाराव होलकर द्वितीय के कार्यकाल (1817 से 1833) में पूर्ण हुआ था। राजवाड़ा होलकर रियासत का प्रमुख प्रशासनिक केंद्र था। आज भी कोई भी धार्मिक या राजकीय उत्सव हो, इसका केंद्र राजवाड़ा ही रहता है। अतीत में होली, रंगपंचमी, दशहरा, दीपावली जैसे पर्वों के आयोजन का शुभारंभ राजवाड़ा से ही होता था। राजपरिवारों का दशहरा प्रमुख पर्व होता था। इसका भव्य जुलूस राजवाड़ा से आरंभ होकर नगर के प्रमुख मार्गों से होता हुआ दशहरा मैदान में शमी पूजन के बाद समाप्त होता था।
जुलूस में मशाल जलाकर करते थे रोशनी
रियासत के दौर में दशहरा का जुलूस राजवाड़ा से सराफा, मारोठिया बाजार, नरसिंह बाजार, कागदीपुरा, बारा भाई होते हुए दशहरा मैदान में ओटले पर शमी पूजन के कार्यक्रम के साथ पूरा होता था। उस वक्त छत्रीबाग से ही वीरान जंगल आरंभ हो जाता था। मार्ग में अंधेरा होने के कारण मशाल जलाई जाती थी ताकि रोशनी रहे। जुलुस के साथ भी कई मशालची उजाले के लिए मशालें साथ लेकर चलते थे।
शमी पूजन के बाद 21 तोपों की सलामी देते थे
शमी पूजन के बाद 21 तोपों की सलामी दी जाती थी। दशहरा मैदान के समीप ही शमी पूजन स्थल है, यहां राज्य के सरदार और होलकर रियासत के मंत्री बैठते थे, राज्य के प्रमुख पंडित कवठेकर जी पूजन संपन्न करवाते थे। होलकर सेना द्वारा 11 हवाई फायर भी किए जाते थे। पालकी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता था। होलकर बैंड अपनी संगीतमय प्रस्तुति प्रस्तुत करता था।
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बलि की परंपरा भी थी
दशहरा पर बलि प्रथा की परंपरा थी। हालांकि, जन भावना को देखते हुए यह प्रथा 1913-14 से बंद कर दी गई। इसके स्थान पर भूरे कद्दू की बलि देने की परंपरा आरंभ की गई।
दरबार हॉल में होता था दशहरा उत्सव
दशहरा मैदान से पूजा करने के बाद देवी-देवताओं का पूजन होता था। महारानी और राजा की आरती उतारी जाती थी। नजर न लगे उसका टोटका भी किया जाता था। दशहरा का उत्सव राजवाड़ा के दरबार हॉल में आयोजित होता था, दशहरा उत्सव तीन दिनों तक आयोजित होता था, तीसरे दी नजराना दरबार आयोजित होता था। नजराना कार्यक्रम में परिवार की निजी सदस्य और सैन्य प्रमुख, अन्य विभागों के प्रमुख आमंत्रित रहते थे।
आज भी जारी है परंपरा
इंदौर में दशहरे के दिन दोपहर में आड़ा बाजार स्थित होलकर हवेली से दशहरा चल समारोह निकलेगा। इसमें होलकर राज्य के निशान, शस्त्र, घोड़े सम्मिलित होंगे, राजवाड़े में मल्हारी मार्तंड के देव स्थान पर पूजन के बाद चल समारोह नगर के प्रमुख मार्गों से होता हुआ दशहरा मैदान पहुंचेगा और वहां बने ओटले पर शमी पूजन होगा। इसके बाद रावण दहन किया जाएगा।