क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ चीजें जिस तरह से होती हैं, वह क्यों होती हैं? क्यों कुछ लोग जीवन में आगे बढ़ते हैं, जबकि दूसरे हर कदम पर लड़खड़ाते हैं? क्यों कुछ रिश्ते, अवसर या चुनौतियां आपके जीवन में आती हैं, किन्तु किसी और के जीवन में नहीं? अगर आपने कभी स्वयं से ये सवाल पूछे हैं, तो आप अकेले नहीं हैं। यह ‘प्रारब्ध’ है। कर्म की प्राचीन भारतीय अवधारणा।
महाभारत में, युद्ध के मैदान पर एक मार्मिक क्षण उत्पन्न हुआ। महान योद्धा कर्ण घायल होता है। श्रीकृष्ण उससे मिलने जाते हैं और कर्ण के आजीवन दु:ख का कारण बताते हैं। यह उसकी बहादुरी या उदारता नहीं थी जो उसके दर्द का कारण थी। यह उसका प्रारब्ध था कि पिछले जन्मों के कर्म जो इस जन्म में सामने आ रहे थे। कर्ण की कहानी हमें कुछ याद दिलाती है। चाहे हम कितने भी कुशल, दयालु या गुणी क्यों न हों, कुछ अनुभव अपरिहार्य हैं। लेकिन वे यादृच्छिक नहीं हैं। वे हमें कुछ सिखाने के लिए हैं।
सत्य तो यह है कि आत्मा अनासक्त है। जब हमारा शरीर और मन प्रारब्ध का अनुभव करते हैं, तो आत्मा अछूती रहती है। शाश्वत आत्मा-साक्षी-दु:ख से परे है, कर्म से परे है, परिस्थितियों से परे है। जब हम यह समझ जाते हैं, तो जीवन की चुनौतियाँ अपनी चुभन खो देती हैं। हम उन्हें वैसे ही देखना शुरू कर देते हैं जैसे वे हैं: हमारे अस्तित्व के सागर पर क्षणभंगुर लहरें।
क्या आपने कभी ऐसी स्थिति में फंसा हुआ महसूस किया है, जिसे आप नियंत्रित नहीं कर सकते? शायद कोई मुश्किल रिश्ता। कोई स्वास्थ्य समस्या। या कोई दुविधा? यह प्रारब्ध है। यह वैश्विक स्तर पर भी दिखाई देता है। जलवायु परिवर्तन को देखें। सदियों से, मानवता ने परिणामों के बारे में सोचे बिना पृथ्वी का शोषण किया। अब, हम परिणाम जी रहे हैं। यह हमारा सामूहिक प्रारब्ध है। लेकिन यहां अब भी आशा है। जबकि हम अतीत को नहीं बदल सकते, हम वर्तमान में कार्य कर सकते हैं।
आज हमारे चुनाव-हमारे अगामी कर्म-एक बेहतर भविष्य को आकार दे सकते हैं। प्रारब्ध यही है। यह पहले से तय की गई चीज़ों को बदलने के बारे में नहीं है। यह इसे स्वीकार करने के बारे में है। हार मानकर नहीं। लेकिन समझ के साथ। यह समझ कि कर्म मन की शुद्धि के लिए किए जाते हैं, भौतिक लाभ के लिए नहीं। तो जब आप जीवन की चुनौतियों का विरोध करना बंद कर देते हैं, तो कुछ जादुई होता है। आपको शांति मिलती है। आपको स्पष्टता मिलती है। आपको स्वतंत्रता मिलती है।
यह बिलकुल भिन्न-भिन्न गानों की ‘प्लेलिस्ट’ के समान है। अपने जीवन को पिछले कर्मों द्वारा तैयार की गई ‘प्लेलिस्ट’ के रूप में सोचें। कुछ गाने आनंददायक हैं। अन्य उदासीन हैं। आपने सभी गाने तो नहीं चुने, लेकिन आप उन्हें अब सुन रहे हैं। प्रश्न यह है कि क्या आप उदास गाने बार-बार बजाते रहते हैं? या आप किसी धीमी या तेज़ ताल पर झूमते हैं, चाहे कुछ भी बज रहा हो? प्रारब्ध हमें वही लय और ताल सिखाता है। ‘प्लेलिस्ट’ को सुनना सिखाता है, क्योंकि संभवतः यह किसी बड़ी संगीतमय शाम का हिस्सा है।
इसी प्रकार जीवन में भी कुछ चमकीले और सुनहरे पल होते हैं; अन्य अंधकारमय होते हैं। आप उन क्षणों से बच नहीं सकते। लेकिन आप चुन सकते हैं कि आप आगे कौन से रंग इस रंगीन जीवन में जोड़ेंगे। जिस प्रकार उपनिषद के दो पक्षी, मित्रता में एकजुट होकर, एक ही पेड़ पर बैठते हैं। एक फल खाता है, दूसरा देखता है।
उसी प्रकार आप अनुभवकर्ता और साक्षी दोनों हैं। बंधे और मुक्त दोनों। और इस द्वंद्व को अपनाने में, आप सत्य की खोज करते हैं। सत्य यह है कि नियति कोई ऐसी चीज नहीं है जिससे लड़ा जाए। इसके साथ बहना है, बढ़ना है और अंततः, उससे परे जाना है। यही हमारा लक्ष्य है, और यही उद्देश्य।