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Dhar Bhojshala:हाईकोर्ट ने फैसले में कहा-भोजशाला में पूजा की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई

Fri, 15 May 2026 07:44 PM IST
Abhishek Chendke न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर

सार

 हाईकोर्ट ने भोजशाला मामले में दिए गए फैसले में कहा कि ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व के स्मारकों का संरक्षण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व वाली प्रतिमाओं और स्थानों की रक्षा करना भी सरकार का कर्तव्य है।
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धार भोजशाला - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हाईकोर्ट ने भोजशाला को लेकर दिए गए फैसले में अयोध्या के फैसले, एएसआई के सर्वे और प्राचीन स्मारकों की रक्षा को लेकर सरकार के संवैधानिक दायित्व का उल्लेख भी किया। कोर्ट ने कहा कि – हमने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्य, एएसआई की अधिसूचनाओं और सर्वेक्षण रिपोर्ट पर, एएसआई अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों और अयोध्या मामले में निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर विचार किया है। अयोध्या मामले में यह माना गया था कि पुरातत्व एक ऐसा विज्ञान है जो बहुविषयक और अंतरविषयक दृष्टिकोणों पर आधारित है और पुरातात्विक साक्ष्यों की प्रकृति को ध्यान में रखता है।

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इसलिए कोर्ट एएसआई द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों से निकाले गए निष्कर्षों और भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों पर भरोसा कर सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह केवल प्राचीन स्मारकों और पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक महत्व के मंदिरों व संरचनाओं का संरक्षण न करे, बल्कि गर्भगृह और आध्यात्मिक महत्व वाले देवी-देवता की प्रतिमा का संरक्षण भी करे।
 

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि समय-समय पर भोजशाला में हिंदू पूजा की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई। भोजशाला के ऐतिहासिक साहित्य से यह स्थापित होता है कि विवादित क्षेत्र भोजशाला के रूप में संस्कृत अध्ययन का एक केंद्र था, जो परमार वंश के राजा भोज से संबंधित था। साथ ही, राजा भोज के काल से जुड़े साहित्यिक और स्थापत्य संदर्भ यह संकेत देते हैं कि धार में देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर का अस्तित्व था।

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