इंदौर के एमवाय अस्पताल के बाहर शुक्रवार को एक बड़ा हादसा होने से टल गया। अस्पताल परिसर में पुलिस चौकी के सामने खड़ी एक पुलिस बस का दरवाजा खुला हुआ था। उसमें चाबी भी लगी हुई थी। एएसआई ड्राइवर की इस लापरवाही का तब तक किसी को पता नहीं चल पाया था। लेकिन उतने ही एक मानसिक विक्षुप्त व्यक्ति बस में चढ़ गया और उसने 20 फीट तक बस दौड़ा दी। दो महिलाएं बस की चपेट में आ गईं और घायल हो गईं। साथ ही वहां खड़ी एक मोटरसाइकिल भी बुरी तरह से श्रतिग्रस्त हो गई। आखिर में बस डीपी से टकराकर रुक गई। यदि बस नहीं रुकती तो और भी लोग घायल हो सकते थे या फिर किसी की जान भी जा सकती थी। जिसके बाद लोगों ने उस व्यक्ति को पकड़कर पुलिस को सौंप दिया।
डीआईजी ने एएसआई को किया निलंबित
एएसआई ड्राइवर कलम सिंह को इस लापरवाही के चलते डीआईजी हरिनारायणाचारी मिश्र ने निलंबित कर दिया है। एएसआई ड्राइवर ने सबह 11 बजे चाबी बस में छोड़ दी थी। इसके अलावा उसने बस का गेट भी खुला छोड़ दिया। अगर बस नहीं टकराती तो कई लोग उसकी चपेट में आ सकते थे। इस बस का इस्तेमाल अस्पताल में पुलिस का रिजर्व फोर्स करता है। बस द्वारा डीआरपी लाइन से फोर्स के जवानों को लाया ले जाया जाता है।
दो महिलाएं आईं बस की चपेट में
जब एक
मानसिक विक्षिप्त व्यक्ति ने वहां बस खड़ी देखी तो वह उसमें चढ़ गया और उसने बस स्टार्ट कर दी। व्यक्ति अर्ध नग्न अवस्था में था। उससे बस संभाली नहीं गई और वहां पेड़ के किनारे बैठी केसर बाई (40) और कामिनी (30) उसकी चपेट में आ गईं। कामिनी के साथ उनका तीन साल का बेटा भी था। जिसे वह एमवाय अस्पताल से छुट्टी कराकर घर ले जा रही थी। जब बस कामिनी से टकराई तो उसने अपने बेटे को गोद में छिपा लिया जिससे उसकी जान बच गई। वहीं एक व्यक्ति का दोपहिया वाहन भी क्षतिग्रस्त हो गया। वह अपने दोस्त की मोटरसाइकिल लेकर चेकअप कराने के लिए अस्पताल आया था। उसने पेड़ के पास ही वो मोटरसाइकिल खड़ी की थी।
अस्पताल ने कहा कोर्ट के कहने पर ही ऐसे लोगों को भर्ती किया जा सकता है
मानसिक रोगियों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती किए जाने पर अस्पताल प्रशासन ने कानून का हवाला दिया है। उन्होंने कहा कि अस्पताल में यदि इस प्रकार के मरीज घूमें तो उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी पुलिस और प्रशासन की है। अस्पताल ने मेटल हेल्थ एक्ट 1987 का हवाला देते हुए कहा कि वह कोर्ट के कहने पर ही ऐसे मरीजों को भर्ती कर सकते हैं। इस कानून के तहत पुलिस को ऐसे मरीजों की पहचान कर उन्हें पकड़ना होता है और 24 घंटे के भीतर सीजेएम कोर्ट में पेश करना होता है। सीजेएम कोर्ट के आदेश के बाद ही मरीजों को भर्ती किया जा सकता है। इसके बाद उनका इलाज करने की जिम्मेदारी अस्पताल की होती है।