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सुना है क्या: 'फंसती दिखी गर्दन तो हो लिए किनारे', साथ ही 'सोशल मीडिया वाले नेता जी व पैसा बोलता है' के किस्से

Fri, 30 Oct 2026 12:14 PM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'फंसती दिखी गर्दन तो हो लिए किनारे' की कहानी। इसके अलावा 'सोशल मीडिया वाले नेता जी' और 'कि पैसा बोलता है...' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

फंसती दिखी गर्दन तो हो लिए किनारे

प्रदेश के चिकित्सा संस्थान में इन दिनों मुखिया के कई खास चेहते दूरी बनाने लगे हैं। इसके पीछे कई तरह की जांचें बताई जा रही है। मुखिया से दूरी बनाने वाले तथाकथित अधिकारी से उनके ही एक सहयोगी ने वजह पूछ ली। अधिकारी ने बताया कि जिस तरह से जांच पर जांच शुरू हो रही है, उससे भविष्य में संकट आने की आहट आ रही है। ऐसे में समय रहते दूरी बनाना जरूरी है।

सोशल मीडिया वाले नेता जी

प्रदेश में युवाओं के इस समय अलग-अलग कई मुद्दे गर्म हैं। ऐसे में इन मुद्दों का नेतृत्व करने वाले और उनका नेता बनने वालों की भी संख्या काफी तेजी से बढ़ी है। कुछ तो जमीन पर युवाओं के मुद्दे उठा रहे हैं तो कुछ सोशल मीडिया पर ही अपनी नेतागिरी कर रहे हैं। हाल ही में ऐसे ही एक नेताजी दो-तीन लोगों के साथ बेसिक शिक्षा निदेशालय पर वीडियो बनाते हुए दिखे। ऐसे में पीछे से किसी ने तंज कसा, ये तो सोशल मीडिया वाले नेताजी हैं। ऐसे में नेताजी झेप गए।

कि पैसा बोलता है...

सुना है कि प्रदेश में जेब भारी हो और खेलों में दिलचस्पी हो तो खेल संघों में पदों की कमी नहीं रहती। खेलों के शौकीन एक महाशय पांच-छह संघों में अहम पद संभाल रहे हैं। खेल के प्रति उनका लगाव अपनी जगह है, लेकिन उनका फायदा उठाने वालों की भी कमी नहीं। चर्चा है कि साहब ऐसे संघों से भी जुड़ जाते हैं, जिनका वजूद तक सवालों में है। अब साहब को कौन समझाए कि हर संघ खेल बढ़ाने के लिए नहीं, कुछ अपना खेल खेलने के लिए भी बनते हैं। अधिकतर खेल संघ कमाई का अड्डा बनकर रह गए है। साहब तो खेलों के भले के लिए सहयोग करते हैं, लेकिन संघ उनका फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

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