नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा को मिली प्रचंड जीत ने पार्टी के बूथ प्रबंधन से लेकर चुनाव प्रबंधन की रणनीति पर मुहर लगा दी है। सपा, बसपा और कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल जब निकाय चुनाव को हल्का मान रहे थे, तब भाजपा ने करीब छह महीने पहले चुनावी तैयारियों से जमीन तैयार करना शुरू कर दिया था। चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि निकाय चुनाव को लेकर भाजपा की ओर से किए गए प्रयोग भी सफल रहे हैं।
भाजपा ने नगरीय निकाय चुनाव की तैयारी अगस्त 2022 से ही शुरू कर दी थी। पहले चरण में भाजपा ने मतदाता सूची तैयार कराने में पूरा फोकस किया। भाजपा और संघ की विचारधारा से जुड़े मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के साथ अवांछित मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटवाए। नगर निकाय चुनाव के बूथों पर बूथ समितियों के गठन से लेकर अग्रिम मोर्चों के जरिये जातिगत और सामाजिक सम्मेलन आयोजित कराकर माहौल तैयार किया गया। डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर सामाजिक समरसता सप्ताह मनाकर दलित बस्तियों में कार्यक्रमों का आयोजन किया।
बूथ प्रबंधन की गहन रणनीति रंग लाई
भाजपा ने बूथ प्रबंधन के लिए गहन रणनीति रची थी। प्रत्येक बूथ पर बूथ प्रभारी, टोली प्रमुख, गली प्रमुख, पन्ना प्रमुख, वार्ड प्रभारी, वार्ड संयोजक, शक्ति केंद्र संयोजक और शक्ति केंद्र प्रभारी की टीम तैयार की थी। आईटी विभाग के संयोजक कामेश्वर मिश्रा की ओर से तैयार पन्ना प्रमुख एप से प्रत्येक मतदान केंद्र पर होने वाले मतदान पर नजर रखने के साथ मतदान के बाद रुझान का आकलन करने में भी मदद मिली।
पहले चरण से सबक ले दूसरे चरण में संभली भाजपा
भाजपा ने पहले चरण में मतदान प्रतिशत गिरने से सबक लेते हुए दूसरे चरण में सबक लिया। दूसरे चरण में मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए मतदाता पर्ची घर घर पहुंचाने, विचाराधार से जुड़े मतदाताओं को घर से निकालकर मतदान कराने में पूरी ताकत लगाई। महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह का भी मानना है कि यदि दूसरे चरण में मतदान बढ़ाने पर फोकस नहीं किया जाता तो दस फीसदी तक मतदान कम होता।
चुनाव को प्रतिष्ठा से जोड़ा - भाजपा ने निकाय चुनाव को भी प्रतिष्ठा से जोड़ा। मुख्यमंत्री ने नगर निकाय चुनाव में 75 में से 43 जिलों में भाजपा प्रत्याशियों के समर्थन में चुनावी सभाएं, सम्मेलन और रैलियों को संबोधित किया। उप मुख्यमत्री केशव प्रसाद मौर्य ने खासतौर पर पिछड़े वोट बैंक वाले इलाकों में भाजपा का मोर्चा संभाला।
उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक पाठक ने लखनऊ में कांग्रेस के दोनों महानगर अध्यक्षों को भाजपा में शामिल कराने के साथ प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस में सेंध लगाकर उनके नेताओं को भगवा पटका धारण कराने में भी अहम भूमिका निभाई। प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी ने चुनावी अभियान को आगे बढ़ाने के साथ अनुशासन का डंडा चलाकर आठ सौ से अधिक बागियों को पार्टी से बाहर भी किया। महामंत्री संगठन धर्मपाल ने राजधानी से चुनाव प्रबंधन की कमान संभालने के साथ सभी 18 मंडल स्तर पर चुनावी अभियान की समीक्षा कर कीलकांटे दुरस्त किए।
भाजपा के चुनावी प्रयोग व नतीजे
- भाजपा ने जीत के लिए सब कुछ किया। अयोध्या और कानपुर में घोषित मेयर प्रत्याशियों के खिलाफ खुलकर नाराजगी सामने आई। लेकिन, इसे नजरंदाज कर कानपुर में प्रत्याशी नहीं बदला, जबकि लखनऊ में महिला सीट होने के बावजूद प्रत्याशी बदल दिया। अयोध्या में भी निर्णय पर अडिग रही। कानपुर में आरएसएस की सलाह नहीं मानी, फिर संघ की नाराजगी को भी नजरअंदाज किया। शाहजहांपुर में जिताऊ प्रत्याशी नजर नहीं आया तो सपा का प्रत्याशी तोड़ लाए। 17 में से 17 नगर निगम में मेयर की जीत बताती है कि हर दांव सटीक बैठा।
- सांसदों व विधायकों के परिजनों को टिकट न देने का फैसला किया। यह प्रयोग मेयर पदों के लिए तो कारगर रहा, लेकिन पालिका परिषद और पंचायतों में सटीक नहीं बैठा। कई सांसदों व विधायकों ने पर्दे के पीछे अपने समर्थक बागियों का समर्थन किया। कई नगर पंचायतें व पालिक परिषद सांसद-विधायक समर्थित बागियों की वजह से भाजपा हार गई।
- चुनाव से पहले बड़ी संख्या में नई नगर पंचायतों का गठन किया और पंचायतों व पालिका परिषदों का सीमा विस्तार कर जनसांख्यिकीय असंतुलन दूर करने का दांव चला। इस प्रयोग का असर ये रहा कि जहां नगर क्षेत्र में शामिल होने वाले गांवों के प्रधानों व का समर्थन भाजपा पा सकी, वहां जीत हासिल हुई। जहां, प्रधानों ने अपना हक छीना जाना महसूस किया, वहां हार गई।
- भाजपा ने केंद्र में मोदी, प्रदेश में योगी सरकार के साथ शहरों में भाजपा की जीत को ट्रिपल इंजन की सरकार के रूप में पेश कर उसके फायदे भी बताए।