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सुना है क्या: बेलगाम नौकरशाह की कहानी, साथ ही 'उत्तराधिकारी बनने की चाहत और भाषण की कोचिंग की जरूरत' के किस्से

Sun, 20 Sep 2026 09:42 AM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'बेलगाम नौकरशाह' की कहानी। इसके अलावा 'उत्तराधिकारी बनने की चाहत' और 'भाषण की कोचिंग की जरूरत' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

बेलगाम नौकरशाह

कुछ नौकरशाह बेलगाम हो गए हैं। वे विभागीय अफसरों को भरी बैठकों में कुत्ता तक कहने में गुरेज नहीं करते। ऑनलाइन बैठकों में तो कई बार विभागीय अफसरों के मातहत भी शामिल होते हैं। अब ये विभागीय अफसर बैठकों में इतना बेइज्जत हो जाते हैं कि बाद में उन मातहतों से काम ले पाने की स्थिति में ही नहीं रहते। मातहत भी उन्हें इग्नोर करने लगते हैं। नतीजतन विभागीय प्रगति प्रभावित हो रही है। चर्चा है कि कोई नौकरशाह उगाही के लिए बेइज्जत करता है तो कोई अपनी सेवा के रौब के लिए।

उत्तराधिकारी बनने की चाहत

हाथी पर सवार एक नेता आपदा में अवसर तलाश रहे हैं। यूं तो उनको ही पार्टी में क्लेश की वजह माना जा रहा है लेकिन इससे उनकी ताकत घटने की जगह बढ़ गई। लिहाजा उनके समर्थक सोशल मीडिया पर नेताजी को उत्तराधिकारी घोषित कर चुके हैं। तमाम ट्रेंड चलाए जा रहे है लेकिन शायद वह भूल रहे हैं कि अपने तो आखिर अपने होते हैं। कहीं उनके लिए चला ट्रेंड उलटा पड़ गया तो गुमनाम होने में देर नहीं लगेगी। उनको तो कोई वोट देने वाला भी नहीं मिलेगा।

भाषण की कोचिंग की जरूरत

एक माननीय को वीआईपी संसदीय क्षेत्र से ताल्लुक रखने के कारण सियासी फायदा तो मिला और वह हाल में मंत्री भी बन गए हैं। लिहाजा अब विभागीय कार्यक्रमों में उनको भाषण भी देना पड़ रहा है। चूंकि पहले संगठन का काम देखते थे तो बिना कुछ पढ़े भाषण देना होता था। अब मंत्री हैं तो विभागीय कार्यक्रमों में लिखा भाषण पढ़ना पड़ रहा है। अब माननीय के सामने सबसे अधिक दिक्कत यह है कि वह पढ़कर उस फ्लो में भाषण नहीं दे पा रहे हैं। हिंदी का भाषण पढ़ने में भी माननीय असहज हो जा रहे हैं। अब लोग तंज कस रहे हैं कि माननीय को भाषण की कोचिंग लेनी चाहिए।

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