कुछ दिन पहले तक सरकार की नाक का बाल माने जाने वाले कम से कम दो अफसर ऐसे हैं, जिनके सामने जाने से मातहत भी कतराने लगे हैं।
जब वह खास पदों पर काबिज थे, तो यही मातहत सैल्यूट मारते नहीं थकते थे। लेकिन, अब उन्हें सामने से आता देख कर मातहत कतरा जाते हैं। उनकी भी मजबूरी है।
आखिर जिससे सरकार नाराज हो, उसके साथ कैसे खड़े हों? कहीं नाराजगी उन पर भी न नाजिल हो जाए।
कुछ दिन पहले इनमें से एक साहब पुलिस मुख्यालय पहुंचे, तो गेट पर मौजूद संतरियों ने तो मजबूरी में सलाम किया।
लेकिन, जब वह कार से नीचे उतरे तो उनके आस-पास कोई नहीं था। बदले हालात देख उन्होंने भी आगे बढ़ना ही मुनासिब समझा।