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कर्मचारियों की लापरवाही से दुधवा में मरी थी बाघिन, दो कर्मचारी निलंबित

Tue, 01 Sep 2020 06:41 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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बाघिन - फोटो : अमर उजाला
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दुधवा नेशनल पार्क में बाघिन कर्मचारियों की लापरवाही से मरी थी। अगर उसे सही समय पर इलाज मिल गया होता तो उसकी जान बचाई जा सकती थी। इसका खुलासा उच्चस्तरीय जांच रिपोर्ट में किया गया है। इस मामले में दो कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है। 11 अगस्त को दुधवा नेशनल पार्क के मैलानी रेंज के बफर जोन में स्थित गांव जटपुरा में एक खेत में बाघिन का शव मिला था। उसे नायलॉन की रस्सी से फंदा लगाया गया था।  इस मामले की जांच मुख्य वन संरक्षक, वन्यजीव पश्चिमी सुनील चौधरी की अध्यक्षता में गठित एक कमेटी को सौंपी गई थी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट मुख्यालय को दे दी है।
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रिपोर्ट के अनुसार, बाघिन ने फंदे में फंसने के बाद नायलॉन की रस्सी को गर्दन से निकालने की कोशिश की। इस दौरान उसके गर्दन में गहरे घाव हो गए। कीड़े पड़ जाने से उसकी हालत बिगड़ती गई। कमजोर हो जाने के कारण उसे कई दिनों तक भोजन नहीं मिला। मौत से पहले वह डिहाइड्रेशन का शिकार भी हुई।  इस तरह से फंदे में फंसने के 3 से 4 दिन बाद उसकी मौत हो गई। अगर इस दौरान उसे डयूटी पर तैनात वन कर्मियों ने देख लिया होता, तो समय पर ट्रेंकुलाइज कर इलाज दिया जा सकता था। इससे उसकी जान बचने की संभावना थी। अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक, प्रोजेक्ट टाइगर पीके शर्मा ने बताया कि इस मामले में संबंधित फॉरेस्ट गार्ड और फॉरेस्टर को सस्पेंड कर दिया गया है। दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन को जरूरी निर्देश भी दे दिए गए हैं।

जांच रिपोर्ट पर उठ रहे सवाल : आईवीआरआई, इज्जतनगर के सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ के पूर्व इंचार्ज व सेवानिवृत प्रधान वैज्ञानिक डॉ. बी बीएम अरोरा ने इस जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बाघ या बाघिन के सामने फंदा आने पर पहले वह अपना पंजा इसमें मारता है। इसलिए गरदन के बजाय फंदे में पैर पहले फंसता है। ऐसी स्थिति में यह भी बताया जाना चाहिए कि उसके पैर (पंजे) में चोट लगी थी या नहीं। गर्दन में फंदा तभी फंस सकता है, जब इसे पेड़ या किसी ऊंचे स्थान पर फिट किया गया हो।  
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डॉ. अरोरा का कहना है की नायलॉन की रस्सी इतना गहरा घाव नहीं कर सकती है, जिससे टाइगर को नुकसान हो। ज्यादा में ज्यादा उसके बालों में रगड़ लग सकती है। नायलॉन की रस्सी से बाघिन उसी स्थिति में मर सकती थी, जब उसकी सांस घुटती या मस्तिष्क को जाने वाली जुगलर वेन (नस) क्षतिग्रस्त होती। सांस घुटने या जुगलर वेन के नष्ट होने पर तत्काल ही बाघिन की मौत हो जाती। फंदे में फंसने के बाद वह तीन-चार दिन जिंदा नही रह सकती थी। इस बारे में सवाल किए जाने पर अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक प्रोजेक्ट टाइगर पीके शर्मा ने बताया कि बाघिन के पंजे में चोट होने के बाबत रिपोर्ट में कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इसका भी उल्लेख नहीं है की फंदा जमीन पर था या उससे ऊपर टांगा गया था।
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