लखनऊ। इतना न मुझसे प्यार बढ़ा..., दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है...., ऐ मेरे दिल कहीं और चल...जैसे गीतों को अपनी आवाज देने वाले तलत महमूद के सुरों की यात्रा को लफ्जों में सहेज रही हैं उनकी नातिन।
शहर की नायाब शख्सियत तलत महमूद की स्मृतियों को सहेजने लखनऊ आईं सहर जमां ने बताया कि वे अपने नाना से जुड़े 70 हजार लफ्जों को लिपिबद्ध कर चुकी हैं। सहर बताती हैं कि किताब का पहला ड्राफ्ट तैयार हो गया है, शेष जल्द पूरा करूंगी। अगले वर्ष नाना के शताब्दी वर्ष पर इसे मैं संगीत प्रेमियों को सौंपूंगी।
सहर कहती हैं कि जब उन्हें पद्मभूषण मिला, उस वक्त मैं 17-18 साल की थी, संगीत के प्रति उनकी दीवानगी को मैं उनके प्रशंसकों के साथ साझा करना चाहती हूं। किताब में नारियल वाली गली, अमीनाबाद का उनका स्कूल, आकाशवाणी में गूंजती उनकी आवाज का जिक्र मिलेगा। लखनऊ का एक लड़का कैसे कोलकाता फिल्म इंडस्ट्री गया, उनका भातखंडे से लगाव, फिर मुंबई तक की यात्रा सबकुछ इसमें शामिल है। यह उनके शताब्दी वर्ष पर उन्हें एक तोहफा होगा।