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सुना है क्या: 'मंत्री जी का संत भाव' की कहानी, साथ ही 'पद बांटने की दुकान और रील का चस्का' के किस्से

Sun, 17 May 2026 08:56 AM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'मंत्री जी का संत भाव' की कहानी। इसके अलावा 'पद बांटने की दुकान' और 'रील का चस्का' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

मंत्री जी का संत भाव

एक नवनिर्वाचित मंत्री संत भाव में आ गए हैं। कौन सा विभाग मिल रहा है? यह सवाल सामने आते ही बड़े उदासीन हो जाते हैं। कहते हैं कि अब तो मंत्री बन ही गए हैं। सात-आठ माह का कार्यकाल शेष बचा है। इतने कम समय में कुछ ज्यादा तो कर नहीं पाएंगे। इसलिए जो विभाग मिल जाए, वही ठीक है। खैर पता चला है, मंत्रीजी सबसे ज्यादा जोर लगा रहे हैं कि किसी भी तरह कोई बड़ा विभाग मिल जाए। हो भी क्यों न, कम से कम एक पूरा वित्त वर्ष तो पड़ा ही है।

पद बांटने की दुकान

पूर्वांचल में एक कहावत है कि राजा को पता नहीं, प्रजा ने बांट लिए। कुछ ऐसी ही स्थिति इन दिनों भगवा दल में है। संगठन में पद बंटने हैं। लिहाजा कई पद बेचते घूम रहे हैं। ये अलग बात है कि उनका मौजूदा पद बचेगा या जाएगा, उनको खुद पता नहीं लेकिन दूसरे को पद बेचते घूम रहे हैं। सियासी गलियारों में ऐसे ही एक पदाधिकारी की चर्चा खूब हो रही है, जिनकी कुर्सी खुद खतरे में हैं लेकिन वह संगठन के मुखिया के साथ गाड़ी में बैठे हुए फोटो दिखाकर लोगों को पद दिलाने का आश्वासन देते फिर रहे हैं। चर्चा तो यह भी है कि कुछ लोगों से तो पद दिलाने का टोकन भी जमा करा लिया गया है।

रील का चस्का

खाकी में रील का चस्का बड़े अफसरों को भी है। स्टाइल के साथ वर्दी का ठाठ सोशल मीडिया की सुर्खियां लूट रही हैं। मामला दफ्तरों तक पहुंच चुका है जिसकी सफाई देना भारी पड़ता जा रहा है। चकाचौंध से दूर रहने वाले हाईकमान अब रील वालों की रेल बनाने का मन बना चुके हैं। फिर फजीहत कराई तो बख्शा नहीं जाएगा। फिर चाहे सिपाही हो या मंझे तलवारबाज।

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