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सुना है क्या: 'चिह्नित से हुए चिंतित' की कहानी, साथ ही 'कोमा में माननीय और रिटायरमेंट मोड में साहब' के किस्से

Mon, 18 May 2026 01:23 PM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'चिह्नित से हुए चिंतित' की कहानी। इसके अलावा 'पॉलिटिकल कोमा में माननीय' और 'रिटायरमेंट मोड में साहब' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

चिह्नित से हुए चिंतित

खेती बाड़ी वाले विभाग से जुड़े एक मंत्रीजी को किसी ने सूचना दे दी कि वे चिह्नित कर लिए गए हैं। ऐसे में उनकी चिंताएं बढ़ गई हैं। जो भी मिलने जाता है, उससे एक ही सवाल पूछते है कि फील्ड में क्या माहौल है? माहौल की थाह लेकर वह अपनी कुर्सी की सलामती का अंदाजा लगाते हैं। उनके कान में किसी ने मंत्र फूंक दिया है कि विस्तारीकरण में उनका कद घटाया जा सकता है। इसकी चिंता में मंत्रीजी पसीना- पसीना हो रहे हैं। क्योंकि वह नहीं चाहते कि चंद माह के लिए उन पर कद घटने का दाग लगे।

पॉलिटिकल कोमा में माननीय

मंत्रिमंडल विस्तार के एक हफ्ते बाद भी विभाग का बंटवारा न होने से माननीय पॉलिटिकल कोमा जैसी स्थिति में है। बड़ी शिद्दत से मात्र कुछ महीने पहले मंत्री का तमगा मिला लेकिन खुशियों में ऐसा ग्रहण लगा कि उससे उबरने के लिए शक्तिपीठों की उपासना की जा रही है। एक का नामजप चल रहा है तो दूसरे मंत्र साधना करवा रहे हैं। उनकी मंडली का कहना है कि भौकाल बनने से पहले ही पीएम साहब का फरमान आ गया और फ्लीट का सपना धरा रह गया। रही सही कसर बिना विभाग के मंत्री के तमगे ने पूरी कर दी है।

रिटायरमेंट मोड में साहब

वैसे तो तबादले का समय किसी भी विभाग के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है किंतु पढ़ाई लिखाई वाले विभाग में इस बार कोई हलचल नहीं है। कारण, बड़े साहब रिटायरमेंट मोड में आ गए हैं। वे अक्सर छुट्टी पर रह रहे हैं और आते भी हैं तो जरूरी काम निपटा रहे हैं। अब नीचे वाले अधिकारी, कर्मचारी खासे परेशान हैं कि करें तो क्या करें। बिना उनके आदेश निर्देश के प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ेगी। कहीं यह सीजन भी ठंडा-ठंडा न निकल जाए।

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