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सुना है क्या: गनर को भी देख लेते हुजूर की कहानी, साथ ही 'कागजों का पुलिंदा व काम बेदम, मलाई में दम' के किस्से

Mon, 25 May 2026 11:28 AM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'थोड़ा गनर का भी देख लेते हुजूर' की कहानी। इसके अलावा 'दराज से हटने लगे कागजों के पुलिंदा' और 'संख्या कम, काम बेदम, मलाई में दम' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

थोड़ा गनर को भी देख लेते हुजूर

असलहों के शौकीन बाहुबलियों और माफिया के सामने जल्द छुरी लेकर चलने की नौबत आ सकती है। अदालत की फटकार के बाद उनकी पसंदीदा चीज छिनने के आसार हैं। हालांकि, उनका सुरक्षा घेरा अभी बरकरार है। एक माफिया तो तीन दर्जन से ज्यादा असलहाधारी साथ लेकर चलता है। इनमें करीब दो दर्जन खाकी वाले भी हैं। इतनी सुरक्षा तो बड़े-बड़े फैसले देने वाले न्यायिक अधिकारियों को भी मयस्सर नहीं है। आम जनता के टैक्स के पैसों से उनकी यह ऐश थोड़ा अदालत वाले हुजूर देख लेते और इस बारे में भी अफसरों को उनकी करतूतों का आईना दिखा देते तो कम से कम कुछ तसल्ली मिल जाती।

दराज से हटने लगे कागजों के पुलिंदे

भगवा दल के संगठन से विदाई की भनक लगते ही कई पदाधिकारी अपने-अपने दराज में रखे कागजों के पुलिंदों की सफाई में जुट गए हैं। ऐसा करने वाले तो कई पदाधिकारी हैं लेकिन एक ऐसे भी हैं जो मंत्रिमंडल के विस्तार होने तक मंत्री बनने की उम्मीद लगाए बैठे थे। पूरी उम्मीद थी कि यूपी से दिल्ली पहुंचे उनके आका मंत्री पद जरूर दिला देंगे तो उन्होंने संभावित मंत्री के तौर पर कई लोगों के काम का बयाना लेकर दराज में रख लिया था। मंत्री पद तो मिला नहीं और अब संगठन से विदाई भी तय मानी जा रही है। लिहाजा वे अब अपने दराज में रखे कागजातों की सफाई में जुट गए हैं।

संख्या कम, काम बेदम, मलाई में दम

सत्ताधारी दल के लोग भी चिंतित है। पावरफुल मंत्रीजी की कार्यशैली ऐसी है कि स्थितियां काबू से बाहर हैं। मंत्रीजी का जातीय बल भी खास नहीं लेकिन उस जाति के प्रतिनिधित्व का अनुपात बाकी जातियों से कहीं ज्यादा है। लोग सार्वजनिक रूप से भले ही न कहें लेकिन अंदरखाने फुसफुसाहट खूब है। असंतोष भी बढ़ रहा है कि न काम के, न संख्या बल के, फिर भी दोहरी मलाई मिल रही है। यह मलाई कुछ अफसरों के होठों की चिपचिपाहट को भी जबरदस्त ढंग से बढ़ाए हुए है।

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