यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'फिर गरमाई ‘अवार्ड’ की चर्चा' की कहानी। इसके अलावा 'इस सजा की अपील कहां' और 'आपसी कलह में न चली जाएं सारी सीटें' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...
फिर गरमाई ‘अवार्ड’ की चर्चा
युवाओं से जुड़े एक विभाग में लंबे समय से एक शिकायती पत्र चर्चा में है। विभाग ने एक अवॉर्ड के लिए 15 नाम शासन को भेजे। वहां से 10 नाम फाइनल हुए, लेकिन सूची में शामिल दो अभ्यर्थियों को सम्मान नहीं मिला। विभाग का तर्क है कि 15 नाम वरीयता क्रम में नहीं भेजे गए थे और बाद में शीर्ष 10 का चयन हुआ। इस पर दोनों अभ्यर्थियों ने लिखित शिकायत की और शासन को भी पत्र भेजा। मगर विभाग अपने जवाब पर कायम रहा और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। अब सवाल यही... जब नाम सूची में थे तो सम्मान की बारी में कहानी कैसे बदल गई।
इस सजा की अपील कहां
खाकी वाले विभाग में एक अधिकारी को मिली सजा की कोई अपील नहीं है। यूं तो अधिकारी की गिनती विभाग के काबिलों और नीति निर्माताओं में होती है लेकिन अनजाने में हुई एक चूक ने भविष्य पर ग्रहण लगा दिया। अधिकारी चंद महीनों में सेवानिवृत्त भी हो जाएगा लेकिन उसके मन में इंसाफ नहीं मिलने का मलाल हमेशा रहेगा। हैरानी की बात ये है कि किसी भी जांच एजेंसी ने उसे जांच के दायरे में लाना तो दूर, कोई सवाल तक नहीं किया। जिनके इशारे पर चूक हुई, वह बेहद चतुराई से अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे। अब देखना यह है कि रिटायर होने के बाद उसके नाम का खुलासा करने की हिम्मत वह कर पाएगा है कि नहीं।
आपसी कलह में न चली जाएं सारी सीटें
राजधानी से सटी औद्योगिक नगरी का हाल बेहाल है। यहां आपस में इस कदर सिर फुटौव्वल है कि एक दूसरे की पोल खुलेआम खोली जा रही है। पार्षद,महापौर, विधायक हों या सांसद...सभी के बीच आपस में ही तलवारें खिची हैं। दिलचस्प बात ये है कि सभी कमल निशान पर जीतकर आए हैं। आपसी खींचतान में शहर का बेड़ा गर्क हो गया है। हाल ये है कि कट्टर समर्थक भी इस बार छिटक गए हैं। व्यापारियों के शहर में जो व्यापारी सीने में जीएसटी का खंजर चलने के बावजूद दिन-रात कमल का फूल हाथ में लिए रहते थे, इस बार पीछे से छोड़िए, सामने से बगावती तेवर अपना चुके हैं।