यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'माननीय का गुप्त झोला' की कहानी। इसके अलावा 'कमाई का खेल' और 'खामोश प्रत्याशी, गुपचुप तैयारी' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...
माननीय का गुप्त झोला
सियासत के साथ ठेका-पट्टा के शौकीन एक माननीय चुनावी फंड के जुगाड़ में हैं। इसके लिए वह गुप्त झोला लेकर चलते हैं। जो भी धनाढ्य मिलता है उससे आग्रहपूर्वक कहते हैं कि अधिकारी बेलगाम हैं और जनप्रतिनिधियों की सुनते ही नहीं। इस वजह से जनता का काम नहीं करा पा रहे हैं तो चुनाव का खर्च कहां से जुटाएं। इसलिए श्रद्धानुसार जो कुछ दान देना चाहते हैं, इसी गुप्त झोले में जमा कर दें। सरकार फिर से बनी तो ख्याल जरूर रखेंगे। अब धनाढ्य को कहां पता है कि माननीय पहले से मालदार हैं और सियासत की आड़ में खनन, होटल और ठेकेदारी के बड़े व्यवसायी भी हैं।
कमाई का खेल
एक गैरमान्यता प्राप्त खेल एसोसिएशन को लेकर चर्चा है कि जहां दूसरे खेलों में सालभर में अधिकतम तीन स्टेट और एक नेशनल चैंपियनशिप होती है। वहीं, इस खेल में 10 से 15 स्टेट और पांच से छह नेशनल चैंपियनशिप तक करा दी जाती हैं। वजह भी दिलचस्प है... प्रदेश में खेल की पांच से ज्यादा एसोसिएशन हैं। इनमें से कई खुद को मान्यता प्राप्त बताकर प्रतियोगिताएं करा रही हैं और खिलाड़ियों से मोटी रकम वसूलती हैं। असली परेशानी खिलाड़ियों की है। उन्हें समझ ही नहीं आता कि किस एसोसिएशन की प्रतियोगिता सही है और किसकी नहीं। नतीजा, मैदान में मेडल की तलाश और जेब में पैसे से निकासी।
खामोश प्रत्याशी, गुपचुप तैयारी
भैयाजी ने कई टिकट घोषित कर दिए हैं। प्रत्याशियों ने भी क्षेत्र में घूमना शुरू कर दिया है और अपनी चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं लेकिन ऐसे सभी टिकटार्थी दुआ मांग रहे हैं कि आधिकारिक रूप से टिकट घोषित हो जाए वरना चुनाव की लागत कई गुना बढ़ जाएगी। मतदाता पूरे हक से चूना लगाने में जुट जाएंगे। यही वजह है कि प्रत्याशी बड़ी ही खामोशी से तैयारी में जुटे हैं। ज्यादातर दरवाजों पर दुआ सलाम तक सीमित हैं।