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सुना है क्या: 'किसकी चली, किसकी नहीं', साथ ही 'यहां सूख गई कलम की स्याही और एक बंगला मिले न्यारा' के किस्से

Tue, 30 Jun 2026 09:48 AM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'किसकी चली, किसकी नहीं' की कहानी। इसके अलावा 'यहां सूख गई कलम की स्याही' और 'एक बंगला मिले न्यारा' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

किसकी चली, किसकी नहीं

भगवा दल की नई टीम में शामिल चेहरों को लेकर अब समीक्षा का दौर चल रहा है। नई टीम में कई ऐसे चेहरे हैं, जिससे लोग हैरान हैं। इसमें कई ऐसे चेहरे भी हैं, जिनका नाम कभी चर्चा में ही नहीं रहा और न ही पार्टी में किसी ऐसे पद पर ही रहे। फिर भी उन्हें बड़ा ओहदेदार बना दिया गया है। ऐसे में दावेदारी खारिज होने के बाद कई दावेदार अब इस बात की समीक्षा करने में जुटे हैं, आखिर नई टीम के गठन में किसका पलड़ा भारी रहा है और किसका हल्का। चर्चा है कि कुर्सी की दौड़ से बाहर हो चुके एक दावेदार ने अपनी यह जिज्ञासा दिल्ली तक में बता आए हैं।

यहां सूख गई कलम की स्याही

जनकल्याण के लिए काम करने वाले एक महकमे में कुंभ से लेकर अब तक प्रचार-प्रसार का काम एक ही फर्म को दिया जा रहा है। अब तक इस फर्म को करोड़ों रुपये का काम मिल चुका है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि कई काम तो बिना उचित प्रक्रिया अपनाए दे दिए गए हैं। बाहर वाले इस मेहरबानी की वजह तलाशते दिखते हैं तो अंदर वाले इस वजह को बखूबी समझ रहे हैं। देखते हैं कि यह खेल कब तक चलता है। छोटे-छोटे मामलों में आपत्ति लगाने वाली कलमों की स्याही इस मामले में क्यों सूख गई है?

एक बंगला मिले न्यारा

खाकी वाले महकमे में एक बंगला कई साल से अफसरों की आंख की किरकिरी बना है। इसके हकदार जाने कितने अफसर आए और गए, लेकिन उनको इसमें कदम रखने का मौका नहीं मिला। जो पूर्व साहब इसमें काबिज हैं, उनसे बंगला खाली कराने का दम बड़े-बड़े सूरमा भी नहीं दिखा सके। कमाल की बात यह है कि यह तकरीबन साल भर खाली ही रहता है। इसमें लगी नेम प्लेट देख अफसर मन मसोस कर रह जाते हैं।
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