फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सुना है क्या: घेराव में भी सुरक्षा का ख्याल, साथ ही 'अरमानों पर फिरा पानी व लानत-मलानत से छूटा पीछा' के किस्से

Fri, 24 Jul 2026 10:39 AM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
विज्ञापन
सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'घेराव में भी सुरक्षा का ख्याल' की कहानी। इसके अलावा 'अरमानों पर फिरा पानी' और 'लानत-मनालत से पीछा छूटा' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

घेराव में भी सुरक्षा का ख्याल

देश के वजीर-ए-आला के घर पर विपक्षियों ने धरना क्या दिया, भगवा दल भी आग बबूला हो गया। लिहाज इस तरफ के लोग भी विपक्षियों को घेरने का ढिंढोरा पीटा। राजधानी में यह आयोजन हुआ। सूबे के संगठन के मुखिया के नेतृत्व में पंजे वाली पार्टी का मुख्यालय घेरने का प्लान बना। इसके पीछे भी रणनीतिकारों ने अपनी-अपनी सुरक्षा का खास ख्याल रखा। चर्चा है कि साइकिल के बजाय पंजे वाली पार्टी मुख्यालय को इसलिए चुना गया, क्योंकि वहां मुकाबला करने वाले कम मिलेंगे और भिडंत का खतरा कम रहेगा। अगर साइकिल वाले दल की ओर जाते तो शायद रक्त रंजित होकर लौटना पड़ता। इसलिए घेराव में सुरक्षा का विशेष ख्याल रखा गया।

अरमानों पर फिरा पानी

कई दिनों से बढ़िया पोस्टिंग की बाट जोह रहे ब्यूरोक्रेट्स के अरमानों पर पानी फिर गया है। सब ठीक चल रहा था कि युवाओं के आंदोलन ने समीकरण बिगाड़ दिए। अब इन हालात में जिलों की कमान संभालने वालों को अचानक हटाना मुश्किल में डाल सकता है। आगे भी बड़े आयोजनों की वजह से स्थायित्व जरूरी है। बेचारे जो साइडलाइन में हैं, उन्हें कुछ दिन और इंतजार करना पड़ सकता है। कहीं फिर कोई बवाल हो गया तो मामला दीपावली के आगे तक भी सरक सकता है। फिलहाल इस माहौल में कमिश्नर, कलेक्टर, कप्तान की कुर्सी दूर की कौड़ी बन गई है।

लानत-मलानत से पीछा छूटा

पिछले डेढ़ महीने से चढ़ावा चोरी का मामला हर तरफ गूंज रहा था। टीवी से लेकर अखबारों में यही मुद्दा छाया था। बड़े-बड़े जिम्मेदारों पर कानूनी शिकंजा तो नहीं कसा था लेकिन मामले के तूल पकड़ने की वजह से उनकी सांसें अटकी थीं। अचानक कॉकरोच ने उनको ऑक्सीजन दे दी। विपक्ष के तरकश के सारे तीर उनकी जगह जंतर-मंतर की ओर चलने लगे। किसी तरह रोज-रोज की लानत-मलानत से पीछा छूटा। अब बस इंतजार क्लीन चिट मिलने का है, जो इन हालात में चुपके से थमाई जा सकती है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें