लखनऊ। कोरोना वायरस से जंग में लखनऊ की स्थिति यूपी के अन्य शहरों से कहीं बेहतर है। आंकड़ों पर गौर करें तो लखनऊ में मरीजों की रिकवरी रेट प्रदेश में सबसे ज्यादा 68.50 फीसदी है तो मृत्युदर भी सबसे कम 0.4 फीसदी है। वहीं, मुरादाबाद व मेरठ में मृत्युदर क्रमश: 5.83 व 5.1 है, जो प्रदेश में सबसे ज्यादा है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से शनिवार शाम जारी आंकड़ों के अनुसार लखनऊ में मिले 247 मरीजों में 165 ठीक हो चुके हैं, जबकि एक मरीज की मौत हुई है। 100 से ज्यादा मरीजों वाले जिलों के आंकड़े देखें तो मुरादाबाद और मेरठ में मृत्युदर सबसे ज्यादा है। दोनों जिलों में रिकवरी रेट क्रमश: 62.5 फीसदी व 33 फीसदी है। रिकवरी रेट को भी देखें तो अलग-अलग ट्रेंड नजर आता है। आखिर ऐसा क्यों है? क्या ये आबोहवा का असर है? या इलाज की सही रणनीति और सक्रियता? इसे लेकर चिकित्सा विशेषज्ञों के अलग-अलग तर्क हैं। केजीएमयू के संक्रामक रोक यूनिट प्रभारी डॉ. डी हिमांशु के अनुसार लखनऊ में सही रणनीति व तुरंत इलाज मिल जाने से ठीक होने में काफी कम समय लगा। वहीं, स्टेट नोडल अधिकारी कोराना व मेडिसिन विभागाध्यक्ष लोहिया संस्थान, डॉ. विक्रम सिंह के अनुसार जिन स्थानों पर मरीजों की ज्यादा मौतें हुई हैं, उनमें दूसरी अन्य शारीरिक समस्याएं भी थीं। मरीज के सामाजिक-आर्थिक हालात का भी अहम रोल होता है। 100 से ज्यादा केस वाले जिलों में रिकवरी रेट में कानपुर सबसे पीछे 100 से ज्यादा मरीजों वाले जिलों में कानपुर नगर में रिकवरी रेट सिर्फ 17.34 फीसदी है तो मृत्युदर 2.04 फीसदी। रिकवरी रेट में मुरादाबाद मृत्युदर ज्यादा होने के बावजूद मेरठ से कहीं आगे है। आगरा में सबसे ज्यादा केस हैं, लेकिन यहां भी रिकवरी रेट 36.9 फीसदी है। जिले रिकवरी रेट मृत्यु दर लखनऊ 66.80 0.4 आगरा 36.9 2.2 गौतबुद्धनगर 57.34 0.46 मेरठ 33.16 5.1 कानपुर नगर 17.34 2.04 गाजियाबाद 44.44 1.58 फिरोजाबाद 41.84 2.17 मुरादाबाद 62.5 5.83 (आंकड़े प्रदेश सरकार की ओर से शनिवार शाम जारी सूची के अनुसार) ----------------- मृत्युदर पर विशेषज्ञों की राय बंटी रिकवरी रेट में अलग-अलग ट्रेंड को लेकर चिकित्सा विशेषज्ञों के अलग-अलग तर्क हैं। ज्यादातर का यही कहना है कि जहां रहन-सहन और खानपान कमजोर होगा वहां मृत्यु दर अधिक होगी। तो कुछ का तर्क है कि कहां मरीजों का कितना आंकड़ा है, उसपर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। अभी आकलन करना जल्दबाजी मरीज के ठीक होने की दर और मृत्यु दर का अभी आकलन करना जल्दबाजी होगी। जहां तक लखनऊ का सवाल है तो यहां जो भी मरीज आए, उन्हें तत्काल चिकित्सकीय सुविधाएं दी गईं। सीतापुर, कन्नौज सहित अन्य स्थानों से रेफर हो करके आए कुछ मरीज हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज वाले थे, लेकिन सही रणनीति और तुरंत इलाज मिल जाने से उन्हें भी ठीक होने में काफी कम समय लगा। जहां तक इलाज का सवाल है तो करीब-करीब एक जैसी दवाएं ही चलाई जा रही हैं। लेकिन दूसरे तरह के कॉम्प्लिकेशन को नियंत्रित करना सबसे अहम बात होती है। डॉ. डी हिमांशु, संक्रामक रोग यूनिट प्रभारी, केजीएमयू मरीजों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी देखनी होगी हम भाग्यशाली हैं कि प्रदेश में अभी मरीजों की मृत्यु दर काफी कम है। जिन स्थानों पर मरीजों की मौतें हुई हैं उनमें दूसरी अन्य शारीरिक समस्याएं भी थीं। मरीज के सामाजिक-आर्थिक हालात का भी अहम रोल होता है। मरीजों का बैकग्राउंड उनकी इलाज लेने की तत्परता और इलाज मिलने की स्थिति पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। इसलिए ठीक होने की दर और मृत्यु दर का अभी तक कोई पुख्ता अध्ययन नहीं हो पाया है। भविष्य में इस पर अध्ययन किया गया तो पुख्ता जानकारी मिल पाएगी। - डॉ. विक्रम सिंह, स्टेट नोडल अधिकारी कोराना व मेडिसिन विभागाध्यक्ष लोहिया संस्थान