दस हजार रेलकर्मियों, पेंशनर्स, परिवारीजनों को नहीं मिलती सुविधा
लखनऊ से सप्ताह में दो दिन एक-दो घंटे के लिए ही आते चिकित्सक
फोटो संख्या 9, 10
संवाद न्यूज एजेंसी
रायबरेली। शहर के रेलवे स्टेशन स्थित अस्पताल बिना डॉक्टर चल रहा है। यहां पिछले नौ महीने से स्थायी चिकित्सक की तैनाती नहीं है। रोजाना ओपीडी में फार्मासिस्ट ही नजर आता है। कहने को हफ्ते में दो दिन लखनऊ से यहां डॉक्टर आते हैं, लेकिन ये डॉक्टर एक-दो घंटे ही बैठकर चले जाते हैं। नियमित रूप से भी इनके आने का कोई ठिकाना नहीं रहता है, जिससे जिलेभर में कार्यरत रेल कर्मियों, पेंशनर्स और उनके परिवारीजनों को स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। इससे 10 हजार से अधिक लोग प्रभावित हैं।
स्वास्थ्य केंद्र उत्तर रेलवे रायबरेली के नाम से संचालित इस अस्पताल में बछरावां, कुंदनगंज, हरचंदपुर, गंगागंज, रायबरेली, ऊंचाहार, लालगंज, डलमऊ, फुरसतंगज, दरियापुर समेत अन्य छोटे स्टेशनों पर कार्यरत रेलकर्मियों और उनके परिवारीजनों के साथ ही पेंशनर्स को स्वास्थ्य सुविधा मिलनी चाहिए। रेलवे का यह इकलौता अस्पताल है, जहां ओपीडी की सुविधा सुबह 9 बजे से दोपहर 1 बजे तक और शाम 4 बजे से 5 बजे तक रहती है। वैसे तो प्राथमिक उपचार यहीं पर होता है, लेकिन गंभीर मरीजों को इस अस्पताल से लखनऊ के रेलवे अस्पताल रेफर किया जाता है।
रेलवे अस्पताल में चिकित्सा अधिकारी, फार्मासिस्ट, ओटी सहायक, असिस्टेंट हाउस कीपर के एक-एक पद और स्वास्थ्य परिचर के दो पद स्वीकृत हैं। इनमें चिकित्सा अधिकारी का पद नौ महीने से खाली है। जब तक यहां स्थायी चिकित्सक की तैनाती थी, तब तक यहां हर रोज औसतन 100 से अधिक मरीज आते थे। डॉक्टर के न होने से मरीजों की संख्या 15 से 20 हो गई है। रेलवे अस्पताल होने के बावजूद रेलकर्मियों को प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराना पड़ रहा है। अस्थाई तौर पर हफ्ते में दो दिन लखनऊ से एक डॉक्टर यहां भेजा जाता है, जो एक-दो घंटे ही यहां रहता है।
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पर्चे पर लिखी दवाएं दे देता है फार्मासिस्ट
रेलवे अस्पताल फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहा है। हफ्ते में दो दिन कुछ समय के लिए आने वाले डॉक्टर पर्चे पर जो दवा लिख देते हैैं, वही दवा फार्मासिस्ट देने का काम करता है। बगैर डॉक्टर के फार्मासिस्ट कोई इलाज नहीं करता है। अगर किसी मरीज के पास पहले से डॉक्टर का लिखा कोई पर्चा नहीं होता है तो उसे दवा भी नहीं मिल पाती है। फार्मासिस्ट विजय कुमार ने बताया कि वैसे तो रोजाना 15-20 लोग दवा लेने आते हैं, लेकिन हफ्ते में दो दिन लखनऊ से यहां डॉक्टर आने पर मरीजों की संख्या 40 तक पहुंच जाती है। वह मानते हैं कि स्थायी चिकित्सक की तैनाती न होने से ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या काफी कम हो गई है। जल्दी ही नए चिकित्सक की तैनाती की उम्मीद है।
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यूनियन पदाधिकारी उठाते रहते समस्या
रेलवे यूनियन के पदाधिकारी इस समस्या को लेकर कई बार आवाज उठा चुके हैं, ताकि स्थायी चिकित्सक की तैनाती हो सके। नारदर्न रेलवे मेंस यूनियन के सहायक मंडल मंत्री सुधीर तिवारी का कहना है कि नौ महीने से ज्यादा समय से स्थायी चिकित्सक नहीं है। इससे रेल कर्मियों, पेंशनर्स और उनके परिवारीजनों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पा रही है। गंभीर होने पर उन्हें लखनऊ जाना पड़ता है। इस मुद्दे को लेकर कई बार उच्चाधिकारियों से बात की जा चुकी है, लेकिन कोई हल निकलता नहीं दिख रहा है। उत्तरीय रेलवे मजदूर यूनियन के सहायक मंडल मंत्री लवकुश का कहना है कि रेलवे अस्पताल में स्थायी डॉक्टर की तैनाती बहुत जरूरी है। शहर ही नहीं, जिलेभर के रेलवे स्टेशनों पर तैनात कर्मचारियों एवं उनके परिवारीजनों को काफी असुविधा होती है।