प्रो. विनय पाठक
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प्रो. विनय पाठक प्रकरण में एसटीएफ ने 117 लोगों से पूछताछ कर कई वैज्ञानिक और अन्य सुबूत जुटाए हैं। कई सुबूतों के आधार पर पाठक के खिलाफ दर्ज मुकदमे में धाराएं भी बढ़ाई गई हैं। एसटीएफ की ओर से शासन को उपलब्ध कराई गई जांच रिपोर्ट में इसका जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रशासनिक अधिकारियों के बार-बार मना करने पर भी पाठक चहेतों के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। जबकि अधिकारी उन्हें आगाह करते रहे कि ऐसा करना ठीक नहीं है। एकेटीयू, आगरा व कानपुर विवि के प्रशासनिक अधिकारियों के बयानों में इसकी पुष्टि हुई है।
सूत्रों के मुताबिक रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि एक्सएलआईसीटी कंपनी के संचालक अजय मिश्र को प्री व पोस्ट परीक्षा के अलावा कई और जिम्मेदारी देने का विरोध किया जाता रहा, लेकिन पाठक ने सारे विरोध को दरकिनार करके चहेतों को उपकृत करते रहे। एसटीएफ ने शासन को यह भी बताया कि पाठक के खिलाफ काफी साक्ष्य मिले हैं। अजय मिश्र की इंदिरा नगर स्थित प्रिंटिंग प्रेस में बिहार कई विवि के अलावा लखनऊ विवि के पेपर भी यहां नियम विरुद्ध तरीके से छापे गए। माना जा रहा है कि यदि सीबीआई ने इस मामले को अपने हाथ में लेती है तो इस प्रकरण में कई सफेदपोश के अलावा बड़े नौकरशाह भी लपेटे में आएंगे।
प्रो. पाठक के खिलाफ सीबीआई जांच के फैसले को चुनौती
कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय पाठक के खिलाफ भ्रष्टाचार मामले की सीबीआई जांच कराने के राज्य सरकार के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में चुनौती दी गई है। प्रो. पाठक के खिलाफ भ्रष्टाचार की एफआईआर कराने वाले डेविड मारियो डेनिस की इस याचिका पर सोमवार को सुनवाई होगी।
याची के वकील अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने मामले की जांच हाईकोर्ट की निगरानी में कराए जाने की भी मांग की है। याचिका में कहा गया है कि एसटीएफ ने जांच लगभग पूरी कर ली थी। ऐसे में मामले की जांच सीबीआई को देकर अभियुक्तों प्रो. विनय पाठक व उसके सहयोगी अजय मिश्रा की मदद का प्रयास किया जा रहा है। अब चार्जशीट दाखिल करने में विलंब होगा। ऐसी स्थिति में जेल में बंद अभियुक्त अजय मिश्रा को जमानत मिल सकती है। वहीं, यह भी कहा गया है कि प्रो. पाठक अभी भी कानपुर विवि के कुलपति हैं और उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई है।
गौरतलब है कि डेविड ने पिछले 29 अक्तूबर को प्रो. पाठक व अजय मिश्रा के खिलाफ इंदिरा नगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया था कि प्रो. पाठक ने आगरा विवि के कुलपति रहने के दौरान उसके कंपनी के किए कार्यों के भुगतान के लिए 15 प्रतिशत कमीशन वसूला। एफआईआर में वादी ने अभियुक्तों से अपनी जान को खतरा भी बताया है।