अभियोजन पक्ष की कमजोर पैरोकारी से सीतापुर में हुए दोहरे हत्याकांड में उम्र कैद की सजा काट रहे दोषी को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष केस को तर्कसंगत संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। इस लिए दोषी को ट्रायलकोर्ट से सुनाई गई सजा के फैसले को रद्द कर जेल से रिहा किया जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति संजय कुमार पचौरी की खंडपीठ ने सुनाया।
कोर्ट वर्ष 2014 में सीतापुर में हुए दोहरे हत्याकांड के मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे चेतराम की जेल से की गई अपील पर सुनवाई कर रही थी। चेतराम की तरफ से यह अपील न्यायमित्र अधिवक्ता राजेश कुमार द्विवेदी ने दाखिल की थी। इसमें अपीलकर्ता ने दोहरे हत्याकांड में सत्र अदालत से सुनाई गई आजीवन कारावास व जुर्माने की सजा के फैसले को चुनौती दी थी।
न्यायमित्र अधिवक्ता का कहना था कि घटना के समय चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी व उनकी विश्वसनीयता संदेहास्पद थी। ऐसे में अभियुक्त संदेह का लाभ पाए जाने के योग्य है। अभियोजन पक्ष की तरफ से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि थानगांव थाना क्षेत्र में चेतराम ने रंजिश के चलते 13 व 14 अगस्त 2014 की रात राकेश मिश्र व मीना देवी की बांके से हत्या कर दी थी। हालांकि अभियोजन पक्ष कोर्ट में केस से जुड़े कोई भी ठोस तर्कसंगत साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया। कोर्ट ने इस मामले में न्यायमित्र अधिवक्ता को 25 हजार रुपए बतौर फीस भुगतान किए जाने का आदेश भी दिया है।