आदमी के जीवन में जब लालच परम की ओर चल पड़ता है तो इंसान इंसान नहीं रह
जाता।
भ्रष्ट राजनीति के चक्कर में आदमी की पहचान, उसके गांव, समाज की
पहचान झंडों के रंग से होती है। इसी व्यवस्था पर चोट करते नाटक लकीर का
मंचन हुआ।
प्रदीप घोष के निर्देशन में हुए मंचन में तेलगू के नाटककार विजय
कुमार की लिखी कहानी को कलाकारों ने उकेरा। नाटक के माध्यम से कलाकारों ने
राजनीतिज्ञों की गिरी हुई मानसिकता पर प्रहार किया।
मंचन में देवाशीष
मिश्रा का बोला गया संवाद ‘जानत हौ कि अच्छे दिन आने वाले हैं, लागत है कि
प्रधानमंत्री बन ही जइहौ...’ ने खूब ठहाके लगवाए।
मंचन में कलाकार विपिन
मिश्रा, राजीव भटनागर, चंद्रभाष सिंह, अनुज मिश्रा, प्रदीप घोष, राधा सिंह
समेत तमाम कलाकार उतरे।