इंश्योरेंस के लिए अनुबंध ग्राहक और बीमा कंपनी के मध्य होता है।
ऐसे में वित्तपोषित संस्था या बैंक की एनओसी क्लेम राशि चुकाने के समय लिए जाने का कोई औचित्य नहीं है।
जिला उपभोक्ता फोरम ने अपने एक आदेश में बीमा कंपनी नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को हर्जाना अदा करने के लिए कहा है।
जानकीपुरम निवासी आशीष कुमार पुत्र राम सहारे ने उपभोक्ता फोरम प्रथम में वाद दायर किया कि 2011 में कार का एक्सीडेंट होने के बाद क्लेम राशि की मांग की।
कंपनी ने गाड़ी को सही करने का एस्टीमेट 4,21,410 रुपए बनाया। वहीं बीमा कंपनी के सर्वेयर ने क्षति का आंकलन कर बताया कि टोटल लॉस हुआ है।
क्षतिपूर्ति के रूप में 2,20,000 रुपए दिए जाएंगे। हालांकि, इंश्योरेंस की डिक्लेयर्ड वेल्यू के मुताबिक 2,65,000 रुपए क्लेम दिया जाना था।
पैसों की जरूरत के चलते परिवादी ने तुरंत भुगतान की शर्त पर सर्वेयर द्वारा तय क्षतिपूर्ति पर ही समझौता कर लिया।
भुगतान करने के उलट कंपनी के स्टाफ ने सुविधा शुल्क दिए जाने की मांग की। भुगतान करने की जगह नो क्लेम कर क्षतिपूर्ति देने से मना कर दिया गया।
कंपनी का कहना था कि कई लैटर के बाद भी परिवादी ने वित्तपोषक बैंक का एनओसी और जानकारी उपलब्ध नहीं कराई।
इसकी वजह से परिवादी के क्लेम को नो-क्लेम करना पड़ा। खुद परिवादी ने मांगी गई जानकारी न देकर लापरवाही करते हुए अपने क्लेम को नहीं बचाया।
फोरम के अध्यक्ष विजय वर्मा ने अपने आदेश में कहा कि जब इंश्योरेंस परिवादी और विपक्षी के बीच था। तो एनओसी की जरूरत क्या थी?
इसका कोई सही जबाव भी बीमा कंपनी ने नहीं दिया। केवल एनओसी नहीं प्रस्तुत करने के कारण दावा को नो-क्लेम नहीं किया जा सकता।
ऐसे में परिवादी को उचित ठहराते हुए क्लेम राशि 2,20,000 रुपए का भुगतान करना ही होगा।
इसके साथ ही 2000 रुपए विधिक व्यय भी चुकाने का आदेश दिया गया है।