लखनऊ। गोमतीनगर स्थित इंदिरागांधी प्रतिष्ठान के मरकरी हॉल में तहजीब-ए-अवध के मंच पर शनिवार को मुशायरे से सजी शाम में शायरी के अलग-अलग रंग देखने को मिले। इनमें देश के नामी शायरों से लेकर अफसरों तक ने अपनी गजलों से मौजूद दर्शकों का मनोरंजन किया।
मुख्य अतिथि प्रमुख सचिव समाज कल्याण डाॅ. हरिओम ने कहा कि आधुनिक दौर में युवाओं का झुकाव पश्चिमी संस्कृति की ओर ज्यादा है। ऐसे में इस तरह के कार्यक्रम हमारी तहजीब का जिंदा रखे हुए हैं। डॉ. खालिद आजमी के संचालन में सजी मुशायरे की महफिल का आगाज डाॅ. अना देहलवी ने अपने कलाम से किया। उन्होंने पढ़ा- पत्थरों में हर पत्थर देवता नहीं होता, साफ कितना हो पानी आईना नहीं होता। मंजिलों को पाने में एक उम्र लगती है, एड़िया उठाने से कद बड़ा नहीं होता...।
सचिवालय में सेक्शन अफसर श्रवण कुमार सेठ ने सुनाया- आफत मची पड़ी है यहां आसमान में, आया है जब से एक परिंदा उड़ान में...। आईएएस अधिकारी पवन कुमार ने की शायरी पर खूब तालियां बजीं। उन्होंने पढ़ा- उसी की याद के बरतन बनाए जाता हूं, वही जो छोड़ गया चाक पे घुमा के मुझे...। अंजू सिंह ने पढ़ा- नजर पे छा गया मंजर पुराना, मिला ब्लेजर से इक पेपर पुराना...।
दानिश अय्यूबी ने सुनाया- रोशनी की जुस्तजू में जिन्दगी कर दी तमाम, और उजाला घर की अलमारी में था रखा हुआ...। वसीम जहांगीराबादी ने पढ़ा- अब मेरे पांव जमीं पर नहीं टिकते यारो, चांद के साथ सफर इतना किया है मैंने...। संचालन डॉ. खालिद आजमी ने और अध्यक्षता फरहत एहसास ने की। इस मौके पर शारिक कैफी, खुशबीर सिंह साद, मदन मोहन दानिश, डाॅ. भावना श्रीवास्तव आदि ने अपने कलाम पेश किए। संयोजक अमरेन्द्र बहादुर सिंह ने सभी का शुक्रिया अदा किया।