फैजाबाद की अख्तरी बाई जो गीत-संगीत और फिल्मों की दुनिया में गजलों की मल्लिका बेगम अख्तर के रूप में चर्चित हुईं। बेगम की शादी लखनऊ के प्रमुख बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी के साथ हुई थी। शादी के बाद बेगम ने गीत-संगीत की दुनिया को अलविदा कह दिया था लेकिन यह फैसला उनके दिल का नहीं था। इसलिए वह बीमार रहने लगी। चिकित्सकों के सुझाव पर उनके पति बैरिस्टर इश्तियाक अहमद ने उन्हें कुछ शर्तों के साथ गाने की अनुमति दी थी। बेगम सुप्रसिद्ध संगीत निर्देशक मदन मोहन के संगीत कंपोजीशन की कायल थीं। बताया जाता है कि 1953 में बेगम अख्तर से कैफ इरफानी की गजल, ‘ए इश्क मुझे और तो कुछ याद नहीं है’ गवाई, जब बेगम फिल्मों के लिए गाना छोड़ चुकी थीं। अख्तरी : सोज और साज का अफसाना, में योगेश प्रवीण ने दोनों के बीच मजबूत रिश्तों से जुड़ा एक संस्मरण लिखा है। संस्मरण कुछ इस प्रकार है, ‘नवंबर 1974 की बात है। बेगम अख्तर की मृत्यु हुए चार दिन बीते थे। बेगम को यहां उनके ही बनवाए पसंदबाग में दफनाया जा चुका था। बेगम की मौत की जानकारी होने के बाद मदन मोहन भी लखनऊ आए। बेगम के पति बैरिस्टर इश्तियाक के कहने पर मैं मदन मोहन को लेकर बेगम की कब्र पर पहुंचा। अभी चार दिन ही हुए थे, इसलिए कब्र कच्च्ची थी। मदन मोहन ने जड़ाऊ चादर से बेगम की कब्र ढक दी और उस पर काफी सारा केवड़ा उडे़ल दिया। कब्र से लिपटकर वे रोने लगे। जैसे-तैसे उनको संभालकर होटल के लिए वापस लेकर चला तो भी यह मशहूर संगीतकार लगातार रोता रहा। मैंने अपनी जिंदगी में किसी मर्द को इतना रोते हुए कभी नहीं देखा था।’