लखनऊ। फैसला हो ही नहीं पाया बहुत बातों के बाद, कौन खुलता है यहां कितनी मुलाकातों के बाद, आंसुओं के सामने पत्थर दिल की क्या बिसात, अच्छे अच्छे घर दरक जाते हैं बरसातों के बाद...। सोमवार की शाम लखनऊ के इरम गर्ल्स डिग्री काॅलेज में आयोजित मुशायरे की सदारत करते हुए देश के मशहूर और अजीम शायर प्रो. वसीम बरेलवी ने जब अपने चुनिंदा शेरों की महफिल सजाई तो लोग वशीभूत होकर सुनते रहे।
इरम एजूकेशनल सोसाइटी के संस्थापक व पूर्व प्रबंधक डॉ. ख्वाजा सैय्यद मोहम्मद यूनुस की याद में उनकी पांचवीं बरसी पर हुए मुशायरे में देश के मशहूर शायर प्रो. वसीम बरेलवी, मंजर भोपाली, डॉ. नवाज देवबंदी, शकील आजमी, डॉ. हरिओम, डॉ. तारिक कमर जैसे शायरों ने शिरकत की। पुश्त में मेरी उतरता हुआ खंजर कोई, और फिर मेरे बराबर से निकलते हुए तुम, अपने हाथों की लकीरों से उलझता हुआ मैं, और फिर मेरे मुकद्दर से निकलते हुए तुम... डॉ. तारिक कमर के इस शेर पर मुशायरे का लॉन तालियों से गूंज उठा।
मशहूर शायरा अंजुम रहबर ने पढ़ा- एक बार मिलने को जो प्यार समझते हैं, पागल हैं मगर खुद को होशियार समझते हैं, ये ऊंचे घरानों के बिगड़े हुए लड़के हैं, जो प्यार के मंदिर को बाजार समझते हैं। वहीं चुटीले अंदाज में मंजर भोपाली ने शेर सुनाया- अब तो गजल सुनाना कठिन हो गया, प्यार का गीत गाना कठिन हो गया, उसके कूचे में अब कैमरे हैं लगे, उसके घर आना जाना कठिन हो गया। भोपाल से आए डॉ. अंजुम बाराबंकवी ने खैर हो खैर कई रोज से कुछ मोम के लोग, जिद किये बैठे हैं सूरज को बुझाने के लिए... सुनाकर वाहवाही बटोरी। शकील आजमी ने पढ़ा - हार हो जाती है जब मान लिया जाता है, जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है, एक झलक देखने को जिस शख्स की चाहत हो जाए, उसको परदे में भी पहचान लिया जाता है।
डॉ. हरिओम पढ़ा- उसको अव्वल मेरे जज्बातों से शिकायत है, उसकी हर बात मैं चुपचाप सुन लेता हूं...। खलील खान ने पढ़ा- आप तो अपने घर में रहते हैं, हम मुसलसल सफर में रहते हैं। शायरा मुमताज नसीम ने पढ़ा- नसीम उसकी बज्म में वफा की बात जब चली, कसम खुदा की उसने मेरा नाम तक नहीं लिया। मुशायरे का संचालन कर रहे लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के अध्यक्ष प्रो. अब्बास रजा नैयर ने पढ़ा- क्या क्या कहना, क्या क्या सुनना पड़ता है, थोड़ा सा जीने की खातिर कितना मरना पड़ता है..। मुशायरे में डॉ. बज्मी यूनुस, डॉ. फैजी यूनुस व डॉ. सैफी यूनुस समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
इनसेट-
मुशायरा एक डेमोक्रेटिक महफिल : प्रो. वसीम बरेलवी
प्रो. वसीम बरेलवी ने कहा कि मुशायरा एक डेमोक्रेटिक महफिल है जहां हर एक विचारधारा, हर क्षेत्र के लोग शामिल हो सकते हैं। मेरी नजर में मुशायरा एक पाबंद आजादी और आजाद पाबंदी है। बोले कि लखनऊ आकर मेरी बिगड़ी तबीयत अच्छी हो गई है। मुशायरे में महिलाओं की बड़ी संख्या देखकर खुश हुए और बोले कि तालीम से तरक्की आई है। उर्दू अदब की दुनिया में अपने 62 सालों को भावुकता से याद करते हुए कहा कि अपने वक्तों में शायरी पढ़ते हुए हम श्रोताओं की तरफ नहीं, मंच पर बैठे फिराक, कैफी आजमी जैसे अपने बुजुर्ग शायरों की आंखों में झांकते थे कि हमारे शेर सुनकर उनकी आंखों में चमक आई या नहीं। यही हमारा हासिल होता था। अब वक्त बदल गया है।