यूपी बोर्ड की इंटरमीडिएट परीक्षा में तीन और हाईस्कूल में 20 विद्यार्थी ही 90 का आंकड़ा छू पाए। इसके पीछे मुख्यत: दो ही कारण निकलकर सामने आ रहे हैं। पहला 90 फीसदी से ज्यादा अंक लाने वाले विद्यार्थियों की कॉपी दोबारा जांचने की अनिवार्यता। दूसरा शिक्षक अभी भी स्टेपवाइज मार्किंग के निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं कर रहे हैं।
इससे यूपी बोर्ड के विद्यार्थियों को अंग्रेजी माध्यम के बोर्ड के समान लाने की कोशिश एक बार फिर सफल नहीं हो सकी। विशेषज्ञों के अनुसार, सीबीएसई और काउंसिल के रिजल्ट में सौ फीसदी तक नंबर दिए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश प्रधानाचार्य परिषद के पूर्व अध्यक्ष डॉ. जेपी मिश्रा के अनुसार, यूपी बोर्ड के विद्यार्थी मार्किंग प्रणाली की वजह से कई बार पिछड़ जाते हैं।
ऐसा कई बार मेरिट से दाखिले या फिर भर्ती की स्थिति में होता है। अधिकारियों ने यूपी बोर्ड को एनसीईआरटी के पैटर्न लाने के साथ ही मूल्यांकन के समय स्टेपवाइज मार्किंग का निर्देश दिया था। इस बार जल्दबाजी में मूल्यांकन हुआ है। ऐसे में शिक्षकों ने स्टेपवाइज मार्किंग के बजाय संभवत: पूर्ण उत्तर पर ही नंबर दिए हैं। इससे परीक्षार्थियों को कम नंबर मिल सके हैं।
वहीं, अन्य बोर्ड पर स्टेपवाइज मार्किंग का पूरा पालन होता है। अगर किसी परीक्षार्थी ने आधे सवाल का सही जवाब दिया है तो फिर से उसे आधे नंबर दिए जाते हैं। भले ही उसने बाद का जवाब गलत लिखा हो। इसके अलावा एक बड़ी वजह परीक्षकों का डर भी है। इस साल निर्देश था कि 90 प्रतिशत से ज्यादा नंबर मिलने पर कॉपी का दोबारा मूल्यांकन होगा। इससे शिक्षकों ने अपने हाथ रोक लिए और नंबर रेस में यूपी बोर्ड के बच्चे पिछड़ गए।