लखनऊ। लगातार गिरता भूगर्भ जलस्तर...। एक साल में करीब 260 दिन जहरीली हवा...। गोमती नदी में सीवर गिराते करीब 17 नाले...। सड़कों पर लगता ट्रैफिक जाम...। गर्मी के शुरुआती दिनों में ही 40 के ऊपर पहुंचने वाला पारा...। किस तरह हम लखनऊ की आबोहवा को खुद खत्म कर रहे हैं, इसके ये नमूने भर हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार पर्यावरण को सुरक्षित बनाने की जगह उसको बर्बाद करने का काम ही किया जा रहा है। जल स्रोत से लेकर हवा, जमीन में जहर घोलने का काम चालू है। हर साल करीब एक लाख नए वाहन सड़क पर आते हैं तो करीब पांच लाख टन कचरा डंप होने वेस्ट प्लांट पर पहुंच जाता है, जोकि सिर्फ प्रदूषण बढ़ाने का काम ही कर रहे हैं। हमारा प्रयास होना चाहिए कि अपने पर्यावरण को संरक्षित रखते हुए जीवन जीएं। ऐसा नहीं कि अपने जीवनशैली से पर्यावरण और इस पृथ्वी को ही खत्म करने लगें। ऐसे में इसके दुष्परिणाम भी जीवन को खतरे में डालने के रूप में सामने आएंगे।
गोमती नदी किनारे विकसित हो ग्रीनबेल्ट
समस्या - गोमती नदी में करीब 33 नाले गिरते हैं। इसमें 17 नालों से रोजाना करीब 650 एमएलडी सीवर नदी में गिरता है। इसका परिणाम यह है कि नदी के पानी का जल गुणवत्ता सूचकांक (डब्ल्यूक्यूआई) ही असुरक्षित की श्रेणी में चला गया है। नदी का पानी बिना शोधन के पीना तो दूर नहाने या अन्य घरेलू उपयोग के लिए भी सुरक्षित नहीं बचा है।
समाधान - नालों को पूरी तरह नदी में गिरने से रोकना होगा। इसके अलावा नदी किनारे ग्रीन बेल्ट बनाने की जरूरत है। इससे नदी का ईको सिस्टम बेहतर होगा। 70 के दशक में गोमती के अलावा लखनऊ में रैठ, बेहटा, कुकरैल, बख, नगवा, अकरड्डी, कादू और सई नाम की आठ नदियां बहती थीं। इनमें से चार नदियां पिछले 50 में गायब हो गई हैं क्योंकि उन पर घर, कॉलोनियां और सड़कें बना दी गई हैं। तीन नदियों को आज नालों के नाम से जाना जाता है। इनको भी पुनर्जीवित किया जाए।
पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए सब्सिडी दी जाए
समस्या - हर साल लखनऊ की सड़कों पर करीब एक लाख से अधिक वाहन बढ़ जाते हैं। 2021-22 में 1.36 लाख नए वाहन बिके। इसकी वजह से लखनऊ में वाहनों की संख्या 29 लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। इससे प्रमुख सड़कों से लेकर चौराहों तक पर जाम के हालात बने रहते हैं। ये वायु प्रदूषण का बड़ा कारण हैं। साल के दो तिहाई दिन प्रदूषित हवा में लोग सांस लेने को मजबूर रहते हैं।
समाधान - पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर बनाते हुए किराए को न्यूनतम रखा जाए। इसके लिए सरकार सब्सिडी दे। ई-बस का उपयोग अधिक से अधिक किए जाने से काफी हद तक लोग निजी वाहनों का उपयोग नहीं करेंगे। मेट्रो सेवा का विस्तार भी कराए जाने की जरूरत है। सरकार प्रयास करे कि लोग निजी वाहनों का उपयोग ही न करें।
वैज्ञानिक तरीके से हो कूड़ा निस्तारण
समस्या - राजधानी में रोजाना करीब 1350 मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है। वैज्ञानिक पद्धति से इसका निस्तारण नहीं होने की वजह से यह अलग-अलग लोकेशन पर डंप किया जाता है। औसतन देखें तो करीब 4.5 लाख टन कचरा हर साल डंप होता है। यह सीधे तौर पर हवा, मिट्टी और पानी को प्रदूषित करने का काम कर रहा है। सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग भी पर्यावरण के अलावा हमारे ड्रेनेज सिस्टम के लिए चुनौती बन गया है।
समाधान - सिंगल यूज प्लास्टिक को रोकने के लिए कागजी कार्यवाही की जगह इसका उत्पादन और बिक्री ही सख्ती से प्रतिबंधित की जाए। लोग भी सिंगल यूज प्लास्टिक के नुकसान को समझें। घरों में ही कूड़े को अलग-अलग किया जाए। वहीं प्लांट पर भी गंभीरता के साथ कूड़े को निस्तारित कराए जाने की जरूरत है। कूड़े को मिट्टी जगह तालाब या गहरी जमीनों को पाटने में बिल्कुल उपयोग न किया जाए।
भूगर्भ जल पर निर्भरता घटाने की जरूरत
समस्या - लखनऊ में भूगर्भ जल में लगातार गिरावट आ रही है। इसकी वजह यह है कि भूगर्भ जल पर निर्भरता सीधे तौर पर बनी हुई है। इसकी वजह से औसतन 1.25 मीटर तक हर साल भूगर्भ जलस्तर शहरी इलाके में नीचे चला जाता है। वहीं, इसके उलट रीचार्ज सिस्टम जैसे तालाब, वर्षा जल संचयन जैसे तरीके भी ठप पड़े हुए हैं। 70 फीसदी तालाब खत्म कर दिए गए हैं। जो तालाब बचे हुए हैं, वह भी अतिक्रमण और कूड़ा डंप किए जाने की वजह से मृतप्राय हो चुके हैं।
समाधान - भूगर्भ जल पर निर्भरता कम करते हुए नदी से मिले पानी से जलापूर्ति अधिकतम की जाए। इसके अलावा तालाबों पर से अतिक्रमण को हटवाते हुए उनको पूर्व की स्थिति में लाना होगा। हमको समझना होगा कि गोमती नदी और लखनऊ के दूसरे इलाकों के तालाब, वेटलैंड की प्रकृति ही भूगर्भ जलस्तर को सुधार सकती है। इनमें औद्योगिक कचरा गिराने वालों पर सख्त कार्रवाई हो।
(जैसा कि विशेषज्ञ प्रो. वैंकटेश दत्ता, फैकल्टी पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग बीबीएयू और डॉ. वीके जोशी पूर्व निदेशक जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने बताया)