इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने आपराधिक मामलों में बंदियों की जमानत मंजूर होने के बाद जमानतनामे दाखिल न कर पाने से जेल में रहने के मुद्दे का गंभीरता से संज्ञान लिया है। जमानत मंजूर होने के बाद भी जमानतनामे दाखिल न कर पाने से जेल में रहने की विवशता को कोर्ट ने आरोपी की व्यक्तिगत आजादी से जोड़कर देखने पर जोर दिया।
कहा कि अपराधिक मामलों में समुचित जमानतनामों की जरूरत से भी इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में ट्रायल कोर्ट जमानत राशि तय करते समय बंदी की हैसियत पर अवश्य गौर करें। यह आदेश न्यायमूर्ति अजय भनोट की एकल पीठ ने बाराबंकी के एक फौजदारी मामले में आरोपी अरविंद सिंह की याचिका को मंजूर करते हुए सुनाया।
कोर्ट ने कहा कि जमानत राशि निर्धारित करते समय ट्रायल कोर्ट को बंदी की सामाजिक और अर्थिक स्थिति पर भी गौर करना चाहिए। कोर्ट ने न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (जेटीआरआई),लखनऊ को भी इन मुद्दों पर शोध करने के लिए कहा। इस मामले में याची का कहना था कि छह केसों में उसकी जमानत मंजूर हुई है लेकिन वह अलग अलग जमानत नामे दाखिल कर पाने में असमर्थ है। ट्रायल कोर्ट ने हर केस के लिए अलग जमानत राशि निर्धारित की है।
कोर्ट ने इस अहम मुद्दे पर विस्तृत आदेश जारी कर याची से सभी छह केसों के लिए एक ही जमानतनामा लिए जाने का आदेश ट्रायल कोर्ट को दिया । यह सभी मामले एक ही कंपनी द्वारा जमाकर्ताओं के खिलाफ किए गए अपराधो से संबंधित हैं। कोर्ट ने इस मुद्दे पर सांविधानिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जेटीआरआई जैसे संस्थानों को इन पर गहन शोध करना चाहिए। इनमें बंदियों की समाजिक व अर्थिक स्थिति और जमानत दाखिल करने की क्षमता, जमानत मंजूर होने पर जमानतनामे न दाखिल कर पाने की वजह से रिहाई न हो पाना आदि मसलों को शामिल किया जाना चाहिए।