लखनऊ। सुल्तानपुर रोड पर सहारा इंडिया की 200 एकड़ जमीन को खरीदकर इंटीग्रेटेड टाउनशिप विकसित करने जा रही कंपनी हमसफर डीलर्स में निवेश करना खतरे का सबब बन सकता है। आयकर विभाग इस जमीन को बेनामी एक्ट के तहत जब्त कर सकता है। आयकर विभाग यह पता लगाने में जुटा है कि इसे खरीदने के लिए किन कंपनियों से रकम हमसफर डीलर्स को भेजी गई।
हमसफर डीलर्स ने टाउनशिप के लाइसेंस के लिए 26 जुलाई 2007 को एलडीए में आवेदन किया था। करीब 15 महीने तक प्रस्ताव ठंडे बस्ते में रहा। सूत्रों के मुताबिक एक वरिष्ठ आईएएस के दखल के बाद हाल ही में टाउनशिप का लाइसेंस जारी किया गया, हालांकि अभी डीपीआर और लेआउट प्लान को मंजूरी नहीं मिली है। इसके बदले वरिष्ठ आईएएस को लखनऊ की एक टाउनशिप में बाजार दर से कम कीमत पर रिहायशी भूखंड देने की चर्चा है।
यह भी पता चला है कि टाउनशिप के लाइसेंस के लिए हमसफर डीलर्स के निदशकों या कर्मचारी के बजाय दूसरी कंपनी के लोग पैरवी कर रहे थे। इस दूसरी कंपनी में हमसफर डीलर्स का असली संचालक नंदकिशोर चतुर्वेदी पहले निदेशक था। प्रकरण में एलडीए के कुछ अधिकारी भी जांच के दायरे में आ रहे हैं, जिन्होंने लाइसेंस के लिए दर्शाए फर्जी टर्नओवर को जांचे बिना अनुमति दी है।
ईडी ने किया था खुलासा
ईडी मुंबई ने मार्च 2022 में खुलाया किया था कि नंदकिशोर चतुर्वेदी तमाम शेल कंपनियां चलाता है। हमसफर के जरिये उसने श्री साईंबाबा गृह निमित्री प्राइवेट लिमिटेड को 30 करोड़ रुपये दिए थे। बाद में यह रकम नंदकिशोर की सांठगांठ से रियल एस्टेट कारोबार में लगाई गई। ईडी इसी मामले में नंदकिशोर को तलाश रहा है, जबकि वह लखनऊ में पिनटेल और हमसफर कंपनी में महाराष्ट्र के राजनीतिक घराने की काली कमाई को निवेश कर रहा है। सारा खेल कोलकाता में शेल कंपनियों के लिए बदनाम लाल बाजार से शुरू हुआ, जहां के पते पर हमसफर और उसकी सहयोगी शेल कंपनियां पंजीकृत हैं। इस इलाके में सेबी ने सैकड़ों शेल कंपनियां संचालित होने का खुलासा बीते दिनों किया था।