लखनऊ। ‘आंसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा। जहां प्रेम की चर्चा होगी, मेरा नाम लिया जाएगा।’ कुछ ऐसी दास्तान थी गीतों के राजकुमार पद्मभूषण गोपालदास नीरज की, जिनकी रचनाओं में आज भी दर्द और प्रेम की अभिव्यक्ति एक साथ देखने को मिलती है। उनके गीतों की ऐसी ही भावप्रवणता जब मंच पर पेश की गई तो श्रोताओं की आंखें नम हो गईं।
मौका था, पद्मभूषण गोपालदास नीरज की 98वीं जयंती के अवसर पर उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान की ओर से बोद्ध शोध संस्थान में बुधवार को आयोजित ‘गीत यामिनी’ का। इस अवसर पर कवि सम्मेलन भी आयोजित किया गया, जिसमें कवियों ने मंत्रमुग्ध कर देने वाली पंक्तियों के जरिए कवि गोपालदास नीरज को नमन किया। गोपालदास नीरज के बेटे शशांक प्रभाकर को कार्यक्रम में विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था। उन्होंने कहाकि पिता के चले जाने के बाद भी आगे उनके धर्म और कर्म का निर्वाह पुत्र की जिम्मेदारी है। जिसे वह पूरा कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहाकि गोपालदास नीरज मात्र मंचीय कवि ही नहीं थे, वह लोगों के दिलों में बसते थे। उनकी रचनाएं आज भी स्मृतियों में गूंजती हैं। शशांक प्रभाकर ने उनकी कविताओं को लेकर कहाकि उनकी कविताएं शाश्वत हैं। उनके शब्दों की गूंज श्रोताओं को आज भी बांधे रखती है। शशांक प्रभाकर ने नीरज की आवाज और अंदाज, भाव-भंगिमाओं को प्रदर्शित करते हुए उनकी रचनाओं का पाठ करना शुरू किया तो दर्शकों को लगा, जैसे मंच पर नीरज जी जीवंत हो उठे हों। उन्होंने ‘आदमी को आदमी बनाने के लिए, जिंदगी में प्यार की कहानी चाहिए’, ‘जो कुछ भी तुम लुटा रहे हो यहां, वो ही तुम्हारे साथ जाएगा’ रचनाएं सुनाईं। साथ ही नीरज द्वारा 1952 से 1954 के बीच रची कविता ‘तीसरा विश्वयुद्ध’ भी पढ़ा, जिसे सुनकर सभागार में उपस्थित श्रोता भावुक हुए। समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर भाषा विभाग के प्रमुख सचिव जितेन्द्र कुमार रहे। उन्होंने कहाकि गोपालदास नीरज जैसे विराट व्यक्तित्व वाले कवि के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने को प्रदेश सरकार ने अब प्रत्येक वर्ष चार जनवरी को उनकी जयंती समारोह मनाने का निर्णय लिया है। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारम्भ सरस्वती वंदना से हुआ। भाषा संस्थान के निदेशक विनय श्रीवास्तव भी मौजूद रहे।
नीरज की याद में सम्मानित होंगे पांच कवि
इंदिरानगर स्थित हेल्प यू एजुकेशनल एन्ड चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा गोपालदास नीरज की 98वीं जयंती मनाई गई। इस अवसर पर ट्रस्ट के पदाधिकारियों, स्वयंसेवकों आदि ने नीरज के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित किया। ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी हर्षवर्धन अग्रवाल ने मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को आभार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक वर्ष पांच नवोदित कवियों को गोपालदास नीरज स्मृति पुरस्कार योजना व लखनऊ में नीरज की भव्य प्रतिमा लगाने की स्वीकृति पर साधुवाद किया।
‘...तुम एल्बम से दबे पांव जब जब बाहर आते हो’
गोपालदास नीरज की जयंती पर आयोजित कवि सम्मेलन की अध्यक्षता यश मालवीय ने किया। उन्होंने कृष्णा सोबती की पंक्ति कोट करते हुए कहा कि लेखक की जिंदगी उसकी मौत के बाद शुरू होती है। इस कार्यक्रम के जरिए नीरज जी दोबारा जन्में हैं। उन्होंने नीरज जी को याद करते हुए पढ़ा-‘तुम घर के आंगन बादल से घिरे रहे बौछारों से, तुम एल्बम से दबे पांव जब बाहर आते हो, कमरे कमरे अब भी अपने गीत गुंजाते हो’। वहीं कवयित्री डॉ सोनरूपा विशाल ने ‘एक सागर सी मैं हो गई, प्रेम की इक नदी के लिए, शून्य होने की चाहत लिए, गुनगुनी गुनाहट लिए...’पंक्तियां सुनाईं। इसी क्रम में रचनाओं के कारवां को आगे बढ़ाते हुए मैनपुरी से आए कवि बलराम श्रीवास्तव ने ‘तुम तो पढ़ते रहे देह भूगोल को, मन के इतिहास को तुमने जाना नहीं, मेरे तन को छुआ, केश धन को छुआ, छू न पाए कभी धड़कनें तुम मेरी...’ सुनाकर श्रोताओं की तालियां बटोरीं। मंच पर इटावा के राजीव राज, गाजियाबाद की नंदिनी श्रीवास्तव, लखनऊ के योगेश शुक्ल व लोकेश त्रिपाठी ने भी रचना पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन हास्यकवि डॉ सर्वेश अस्थाना ने किया।
ऐसे थे गीतों के दरवेश नीरज...
पद्मभूषण गोपाल दास नीरज गीतों के ऐसे दरवेश थे, जिनका बचपन मुफलिसी में बीता, पर उन्होंने संघर्ष का दामन नहीं छोड़ा। जब उनकी उम्र कम थी, पिताजी गुजर गए। फूफाजी 5 रुपये भेजते थे। जिसमें पूरे परिवार का गुजारा करना पड़ता था। उन्होंने सम्मेलनों में नि:शुल्क काव्यपाठ करते थे। मंच पर उन्हें हरिवंशराय बच्चन का साथ मिला। फिरोजाबाद में उन्हें पहली बार काव्यपाठ केलिए पांच रुपये मिले थे। इतना ही नहीं ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित हुए गीत ‘कारवां गुजर गया...’ ने नीरज जी को ओवरनाइट हीरो बना दिया।