लखनऊ। जिस नवजात को मां-बाप ने लाइलाज बीमारी से ग्रसित समझकर यमुना में बहा दिया था, केजीएमयू के डॉक्टरों ने उसे नया जीवन दे दिया है। ब्लैडर एक्सट्रॉफी (फटे मूत्राशय) से पीड़ित मासूम को पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रो. एसएन कुरील ने सर्जरी कर ठीक कर दिया है।
मथुरा के राजकीय बालगृह शिशु के अधीक्षक राजेश वर्मा ने बताया कि वर्ष 2021 में जन्माष्टमी के दिन यमुना में टोकरी में बहता हुआ नवजात मिला था। पुलिस ने उसे बालगृह पहुंचाया। बच्चे की नाभि के स्थान से लेकर मूत्राशय तक त्वचा फटी थी और आंतें बाहर नजर आ रही थीं। इससे उसक ी पेशाब लगातार रिस रहती थी।
बालगृह के स्टाफ ने बच्चे को पाला और इस बीच उसका इलाज भी कराते रहे। इसी दौरान जानकारी मिली कि केजीएमयू में इस बीमारी की सर्जरी होती है। इस साल अगस्त में केजीएमयू के डॉ. एसएन कुरील ने बच्चे को देखकर सर्जरी करने की सलाह दी। भर्ती करने के बाद उन्होंने जन्माष्टमी के ही दिन उसकी सर्जरी की। इसके चार महीने बाद मंगलवार को मासूम को छुट्टी दे दी गई।
आठ घंटे तक चली सर्जरी
डॉ. कुरील ने बताया कि बच्चे की सर्जरी में करीब आठ घंटे लगे। ऑपरेशन के दौरान सबसे बड़ी चुनौती सभी नसों को ठीक से जोड़ने की थी। ऐसा न होने पर बच्चे को समस्या हो सकती थी। अब बच्चा सामान्य जीवन जी सकेगा। वयस्क होने पर शादी और प्रजनन में भी सक्षम होगा। इस ऑपरेशन में एक लाख रुपये के करीब का खर्च आया। निजी अस्पतालों में यह खर्च आठ लाख रुपये तक है।
डॉ. कुरील ने ही खोजी है तकनीक
केजीएमयू के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. एसएन कुरील ने बताया कि वर्ष 2010 में उन्होंने फटे मूत्राशय पर गहन शोध किया था। इसमें खून और अन्य नसों की स्थिति का पता लगाया गया, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। इसके बाद ही इस तरह की सर्जरी संभव हो सकी।
सर्जरी से संभव है इलाज
प्रो. एसएन कुरील नं बताया कि यह लड़का बीमारी से ग्रसित था। शायद इसी वजह से मां-बाप ने उसे नदी में बहा दिया होगा। सर्जरी से इस बीमारी का इलाज संभव है। अच्छा होता अगर मासूम को अपने मां-बाप मिल जाते।