लखनऊ। केजीएमयू के एनस्थीसिया विभाग की ओर से शनिवार को हजरतगंज स्थित एक होटल में परातन छात्र मिलन समारोह हुआ। इसमें विभाग से पीजी करने वाले छात्र-छात्राएं शामिल हुए। डॉक्टरों ने पुराने दिनों की याद कर खूब ठहाके लगाए।
सालों बाद मिले पुराने दोस्तों को पाकर डॉक्टर भावुक भी हो गए। इस मौके पर विभाग की अध्यक्ष डॉ. मोनिका कोली ने प्रगति रिपोर्ट पेश की। डॉ. तन्मय तिवारी ने कहा कि क्रिटिकल केयर में गंभीर मरीजों को एनस्थीसिया विशेषज्ञ नया जीवन दे रहे हैं।
एनस्थीसिया कॉटेज मतलब भूत बंगला
इंग्लैंड से आई वर्ष 1993 बैच की डॉ. छवि ने बताया कि केजीएमयू में पढ़ाई के दौरान खूब काम किया। इमरजेंसी ड्यूटी में तैनात रेजिडेंट डॉक्टर एनथीसिया कॉटेज में ही ठहरते थे। जैसे-जैसे रात गहराती थी हम सबका सवेरा होता था। फुरसत होने पर पार्टी होती थी। आधी रात बाद चाट, मक्खन समेत दूसरे लखनवी पकवान मंगाए जाते थे। जिन्हें सभी मिलकर चटखारे लगाकर खाते थे। उस वक्त एनस्थीसिया कॉटेज को भूत बंगला के नाम से जाना जाता था। अब दौर बदल गया है। काम के साथ मौज-मस्ती का वक्त ही नहीं मिलता।
टूटती सांसों को जोड़ देती है एनस्थीसिया
केजीएमयू से वर्ष 2016 में पीजी करने वाले डॉ. रुपेंद्र अग्रवाल वर्तमान में लोकबंधु अस्पताल में एनस्थीसिया विशेषज्ञ हैं। उन्होंने बताया कि एमडी में दाखिला लेने के बाद मुझे एनस्थीसिया की परख हुई। इमरजेंसी में एक मरीज बेहद गंभीर हालत में आया था। ईसीजी कराई गई तो उसमें लकीरें एकदम सीधी आईं। मतलब मरीज की जान जा चुकी है। एक सीनियर डॉक्टर ने मरीज को कुछ देर सीपीआर दिया। जीवनरक्षक दवाएं दीं। कुछ देर बाद मरीज की सांसें चलने लगीं। इसके बाद मुझे एनस्थीसिया का मोल समझ आया।
तब वेंटीलेटर था न ऑक्सीमीटर
रियाद से आए डॉ. ज्ञानेंद्र ने 1985 में केजीएमयू एनस्थीसिया विभाग से पीजी किया। उन्होंने बताया कि उस दौर में न तो वेंटीलेटर होते थे न ही पल्स ऑक्सीमीटर था। ऑपरेशन के दौरान व बाद में हाथ से पल्स का आंकलन किया जाता था। वह भी एक दौर था।