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‘दृष्टिकोण में संतुलन बनाएं न्यायिक अधिकारी’

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उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश दिनेश माहेश्वरी ने न्यायिक अधिकारियों से दृष्टिकोण में संतुलन बनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि न्याय हमेशा पक्षकार केंद्रित नहीं, बल्कि कारण केंद्रित होना चाहिए। इसका अर्थ है कि हम न्याय किसी कारण के लिए कर रहे हैं, न कि किसी पक्षकार के लिए। उन्होंने कहा कि हमें पीड़ितों को ऐसा वातावरण देने की जरूरत है, जिसमें उनके साथ-साथ हमारी भी सहभागिता हो।
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उन्होंने ये बातें शनिवार को गोमतीनगर स्थित न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान में जिला न्यायालयों में कार्यरत न्यायिक अधिकारीगण को और अधिक संवेदनशील बनाने के उद्देश्य से शुरू हुए दो दिवसीय कॉन्फ्रेंस में बतौर मुख्य अतिथि कहीं। कॉन्फ्रेंस का विषय ‘सेंसीटाइजेशन ऑफ डिस्ट्रिक्ट जजेस ऑन जेंडर जस्टिस एंड डिफ्रेंटली एबल्ड विक्टिम्स सरवाइवर्स ऑफ सेक्सुअल एब्यूज है।’ इसमें 250 न्यायिक अधिकारी प्रतिभाग कर रहे हैं।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने कहा कि बोर्ड परीक्षा परिणामों में हमारी बेटियां बेटों से ज्यादा अंक हासिल कर रही हैं और उनका उत्तीर्ण प्रतिशत भी ज्यादा है। हम ऐसे प्रदेश में रहते हैं जहां पर रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी गोद में एक बेटे के साथ सवतंत्रता संग्राम में अभूतपूर्व योगदान दिया था। उन्होंने कहा कि हमारी बेटियां या महिलाएं तब तक सफल नहीं हो सकतीं, जब तक उन्हें परिवार तथा समाज का सहयोग प्राप्त न हो। यह हमारी जिम्मेदारी है कि समाज के तौर पर हम प्रत्येक महिला को सहयोग प्रदान करें। उन्होंने अपर्णा भट्ट, पतन जमाल वाली केस में उच्चतम न्यायालय के विभिन्न विधि व्यवस्थाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि शबरीमला केस, महिलाओं की आर्मी में नियुक्ति आदि में दिए गए सभी विधि व्यवस्थाओं का सूक्ष्मता से अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने प्रदेश में लंबित वादों का उल्लेख करते हुए कहा कि वादों का लंबित रहना यह दर्शाता है कि उन्हें न्याय नहीं प्राप्त हो रहा है।
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने कहा कि ऐसी संगोष्ठियां जनमानस से ज्यादा स्वयं को शिक्षित करने के लिए आयोजित होती हैं। जब हम अपने कार्य स्थल पर वापस लौटें तो उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित किए गए लक्ष्यों का अनुपालन करना चाहिए। इस अवसर पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल ने कहा कि महिलाओं को पूजा नहीं, अहसास चाहिए। उनके वजूद का महत्व होना चाहिए। वो अपनी जगह स्वयं बना लेंगी। उन्हें किसी पूजा की जरूरत नहीं है। इससे पहले सभी का स्वागत उच्च न्यायालय लखनऊ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने किया और अंत में संस्थान के निदेशक विनोद सिंह रावत ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन संस्थान के अपर निदेशक (अनुसंधान) डॉ. हुमायूं रशीद खान ने किया।
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