राजनीति में कब किसे क्या करना पड़ जाए कहा नहीं जा सकता। अब बेचारे चौधरी साहब को ले लीजिए।
कभी सपने में नहीं सोचा होगा कि जेल मंत्री रहते हुए किसी कैदी और उसके कुनबे की हिमायत करनी पड़ेगी।
जेल में सजा काट रहे कई घोटालों के आरोपी बाबूसिंह कुशवाहा के कुनबे को पार्टी में शामिल कराने की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर डाल दी गई।
वैसे तो मीडिया से उनके संबंध ठीक-ठाक हैं लेकिन किसी सजायाफ्ता और उसके परिवार के लोगों की मीडिया के सामने पैरवी उन्हें काफी भारी पड़ गई।
समर्थकों व शुभचितंकों के बीच उनकी छवि भले ही साफ-सुथरी और ईमानदार नेता की हो लेकिन कुशवाहा एंड कंपनी के साथ बैठकर उन्होंने अपनी फजीहत तो करा ही ली।
काम लेकर पहुंचने वाले क्षेत्र के जिन लोगों को वह उल्टी-सीधी सिफारिश न करने की नसीहत देते हुए झिड़क देते थे वही आज चुटकी ले रहे थे कि भइया, कहां चला गया सिद्धांत।
काजल की कोठरी में जाएंगे तो कालिख लगेगी ही। जेल में बंद अपराधियों के प्रति ऐसी ही हमदर्दी दिखाते रहे,
तो वह दिन दूर नहीं जब ज्यादातर कैदियों के नाते-रिश्तेदार शान से ‘साइकिल’ पर सवारी करते नजर जाएंगे। यही तो है सच्चा समाजवाद।