बात 1948 के आसपास की है। प्रदेश में नागरी लिपि सुधार का काम चल रहा था। प्रसिद्ध साहित्यकार भगवती शरण सिंह नागरी सुधार समिति के सदस्य सचिव बनाकर लखनऊ बुलाए गए। उन्होंने राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन और आचार्य नरेन्द्र देव की देखरेख में काम शुरू किया। उन्हें प्रतिदिन टंडन और आचार्य से मिलना होता था। कभी-कभी जब आचार्य नरेन्द्र देव, टंडन के यहां जाते तो सिंह को भी वहां बुला लेते। एक दिन जो हुआ उसे सुनकर कोई भी दांतों तले अंगुली दबा सकता है कि इन महापुरुषों ने कितनी मुसीबतें उठाकर देश की नींव को मजबूत किया। सिंह ने एक संस्मरण में लिखा है, ‘एक दिन राजर्षि टंडन ने सुबह-सुबह ही मुझे अपने यहां बुला लिया। पहुंचा तो देखा कि आचार्य नरेन्द्र देव भी वहां मौजूद हैं। बात करते-करते दिन के डेढ़ बज गए। आचार्य नरेन्द्र देव ने जाने की आज्ञा मांगी। टंडन जी को ध्यान आया कि इतना समय हो गया है। आचार्य नरेन्द्र देव के भोजन का भी समय हो गया है। उन्होंने आचार्य से कहा, ‘नरेन्द्र देव अब भोजन करके जाओ। भोजन करते हुए और भी बातें हो जाएंगी।’ मुझे साथ लेकर दोनों लोग भोजन की मेज पर बैठ गए। रसोई से तीन छोटी-छोटी थालियां लाकर हम लोगों के सामने रख दी गईं। फिर उनमें दो छोटी-छोटी ककड़ियां और एक-एक डली गुड़ आ गया। मैं सोच रहा था कि अब दाल और रोटी आएगी। पर, यह क्या! राजर्षि टंडन और आचार्य ने भोजन शुरू कर दिया। मैं अपनी थाली को निहार रहा था। तभी टंडन जी ने आवाज लगाई, ‘अरे भाई! घर में अगर रोटी हो तो भगवती के लिए ले आओ।’ रसोई से निकले व्यक्ति ने एक रोटी मेरी थाली में रख दी। मैं समझ गया कि टंडन जी के यहां यही उपलब्ध है। यह सोचकर मेरे दिल में टंडन जी के लिए श्रद्धा और बढ़ गई।’