यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'नए ठौर की तलाश में माननीय' की कहानी। इसके अलावा 'एजेंसी का जोर या कुछ और' और 'सचिवालय में भैया तल' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...
नए ठौर की तलाश में माननीय
हाथी से उतरकर हाथ में कमल का फूल थामने वाले एक माननीय के सामने नया संकट खड़ा हो गया है। दरअसल इन दिनों सत्ताधारी दल में "एंटी इनकम्बैंसी" की सूची तैयार हो रही है। इसमें माननीय का नाम सबसे प्रमुख है। चूंकि माननीय इधर साल-दो साल के कई मामलों में चर्चित भी रहे हैं। इसलिए माना जा रहा है कि माननीय की छवि पर लगे दाग की वजह से इस बार उनका पत्ता कट सकता है। ऐसे में माननीय भी ठहरे खिलाड़ी, लिहाजा उन्होंने भी नए ठौर की तलाश शुरू करने का प्रचार करके दबाव बनाने में जुट गए हैं।
एजेंसी का जोर या कुछ और
ब्यूरोक्रेसी में हुए एक साहब के विभाग में बदलाव को केंद्रीय एजेंसी की नाराजगी से जोड़ा जा रहा है। दरअसल सेवा से मुक्त होने के मुहाने पर खड़े अफसरों के साथ अमूमन ऐसा होता भी नहीं है। लिहाजा इसकी सियासी वजह भी तलाशी जा रही है। यह भी चर्चा है कि कहीं जांच को लटकाने-भटकाने की वजह से तो साहब पर गाज नहीं गिरी। दरअसल जांच में जो पूर्व माननीय फंसे हैं उनका नाता दो दलों से रहा है। घोटालों के हिस्ट्रीशीटर रहे हैं। भला उनकी बर्बादी को रोकने में किसका फायदा हो सकता है? इसकी पर गौर किया जा रहा है। खैर.. सियासत में कुछ भी हो सकता है।
सचिवालय में भैया तल
सचिवालय में एक तल ऐसा है, जिसे स्टाफ ने भैया तल की संज्ञा दे दी है। इस तल पर दोनों ओर ऐसे नौकरशाहों का दफ्तर था, जो आपस में सगे भाई हैं। अब इनमें से एक का ट्रांसफर हो चुका है। उनके जाने के बाद भी स्टाफ इसे भैया तल ही कह रहा है। स्टाफ का तर्क भी ठीक है कि नाम बार-बार थोड़े ही बदले जाते हैं, जो एक बार नामकरण हो गया सो हो गया....।