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सुना है क्या:'नहीं गली माननीय की दाल' की कहानी, साथ ही 'ऑफलाइन सर्च' और 'मुफ्त का चंदन' के किस्से

Mon, 11 May 2026 01:46 PM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'नहीं गली माननीय की दाल' की कहानी। इसके अलावा 'ऑफलाइन सर्च' और 'मुफ्त का चंदन' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

नहीं गली माननीय की दाल

सूबे में मंत्रिमंडल विस्तार पर कई माननीयों की टकटकी लगी थी। सभी दावेदार अपने-अपने हिसाब से जुगाड़बाजी में लगे थे। ऐसे ही एक माननीय हैं जिन्होंने दिल्ली की खूब दौड़ लगाई लेकिन विस्तार हुआ तो उनका सारा जुगाड़ फेल हो गया। विस्तार होने के कुछ देर पहले तक माननीय लगातार दिल्ली के संपर्क में रहे लेकिन अंतिम समय में भी उनकी दाल नहीं गली। विस्तार के लिए आयोजित समारोह में शामिल होने के लिए माननीय को सूचना दी गई तो वह भ्रम में आ गए कि अब तो उनकी दाल पक ही गई लेकिन जब शपथ होने लगी तो उनका नाम गायब था।

ऑफलाइन सर्च

एक नौकरशाह ने सांविधानिक संस्था को खुली चुनौती दे डाली लेकिन उनका बाल भी बांका न हुआ। कई नौकरशाहों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके इस कदम को साहसिक बताते हुए उन्हें सैल्यूट भी किया। हालांकि, ऐसा करने वालों में वे नौकरशाह ज्यादा शामिल हैं जो किसी न किसी वजह से सिस्टम से खफा हैं। इस सबका नतीजा यह हुआ कि चुनौती वाले नौकरशाह का उत्साह बढ़ गया है। अब वह सांविधानिक संस्था के मुखिया के रिश्तेदार और रिश्तेदारों के रिश्तेदार कहां-कहां तैनात हैं, पूरा सिजरा इकट्ठा करा रहे हैं। इस फेहरिस्त को विपक्ष के साथ साझा भी कर रहे हैं जो आने वाले दिनों में लोकतांत्रिक लड़ाई का बड़ा रूप धारण करे तो हैरानी की बात नहीं। शेष आप खुद समझदार हैं...।

मुफ्त का चंदन

शहर में मैच होना खाकी वालों के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं है। अरबों के इस खेल में खिलाड़ी ही नहीं सब मालामाल होते हैं लेकिन मुफ्त में पसीना उनको बहाना पड़ता है। कड़ी धूप में जहां-तहां खड़ा करने में अफसर मुरव्वत नहीं करते। बदले में विभाग को धेला भी नसीब नहीं होता। एक अफसर ने इस मुफ्त सेवा को बंद करने और काम के बदले दाम का प्रस्ताव बनाया था लेकिन शो टाइम के ग्लैमर के शिकार बाकियों ने उसे दफन कर दिया। विभाग में आजकल इस मुफ्त के चंदन की खूब चर्चा है।

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