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सुना है क्या: 'माननीय को समझना मुश्किल', साथ ही 'नाक के नीचे डील और क्यों उखड़ा है माननीय का मन' के किस्से

Sun, 02 Aug 2026 11:49 AM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'माननीय को समझना मुश्किल' की कहानी। इसके अलावा 'नाक के नीचे डील...साहब बेखबर' और 'क्यों उखड़ा है माननीय का मन' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

माननीय को समझना मुश्किल

दो-दो मकहमों के मुखिया बनाए गए माननीय की मंशा समझने में मातहतों को पसीना आ रहा है। दरअसल, नौकरशाही त्याग सरकार चला रहे माननीय जिलास्तरीय दफ्तरों, सेक्शन या विशेष सचिव के स्तर से होने वाले काम भी खुद ही करना चाहते हैं। ऐसे में ऐसे कामों की फाइलें भी माननीय के पास अटक जाती हैं, जो निचले स्तर की हैं। जिले में किसी को चार्ज देना हो या अनुभाग बदलना हो, सबका फैसला फाइल का वजन नापकर होता है। माननीय की मुहर के बिना छोटी से छोटी फाइल भी आगे नहीं बढ़ती है।

नाक के नीचे डील...साहब बेखबर

जांच एजेंसी ने एक बड़े विभाग में घूसखोरी के गिरोह का खुलासा किया। कर्मचारी ही नहीं अधिकारी भी पकड़ा गया। ये सब बड़े साहब की नाक के नीचे हो रहा था। जिस तरह के मामले में खेल चल रहा था, कोई नया नहीं है। वर्षों से संगठित तरीके से लाखों रुपये की वसूली होती रही है। सवाल है कि आखिर इससे बड़े साहब बेखबर क्यों रहे। जांच एजेंसी के अधिकारी भी इसकी चर्चा कर रहे हैं। शायद कई और बड़ों तक इसकी जांच की आंच पहुंच सकती है।

क्यों उखड़ा है माननीय का मन

एक माननीय जब से मंत्री बने हैं तब से उनका एक पांव लखनऊ में तो दूसरा दिल्ली में रहता है। अब वह किसी से मिलते भी हैं तो वैसा जोश नहीं दिखता, जैसा पहले कार्यकाल में था। लिहाजा सत्ता के गलियारों वाले उनके ईष्ट मित्र माननीय की बेरुखी को लेकर चिंतित हैं। चर्चा कर रहे हैं कि आखिर माननीय का मन उखड़ा-उखड़ा क्यों हैं। दरअसल, माननीय को उम्मीद थी कि कद के मुताबिक महकमा मिलेगा लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ। इसलिए माननीय महकमे में मन लगाने के बजाय आगे के समीकरण दुरुस्त करने में लगे हैं ताकि 2027 में मुराद पूरी हो सके।

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