- दुष्कर्म मामले में तलब टीटीई के खिलाफ केस की कार्यवाही रद्द
- कैंसर पीड़ित 57 साल के याची को मिली राहत
संवाद न्यूज एजेंसी
लखनऊ। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने फौजदारी प्रक्रिया के अहम फैसले में कहा कि केस की जांच या विचारण (ट्रायल) के दौरान ट्रायल कोर्ट किसी को बिना ठोस सबूत के तलब नहीं कर सकता। इसके लिए मजबूत साक्ष्य व संतुष्टि जरूरी है। इस अहम नजीर के साथ कोर्ट ने दुष्कर्म मामले में तलब किए गए टीटीई के खिलाफ केस की कार्यवाही निरस्त कर दी। इससे कैंसर पीड़ित 57 साल के रेलवे के टीटीई (याची) को बड़ी राहत मिली है। वर्ष 2007 का यह मामला शहर के नाका थाने से संबंधित था।
न्यायमूर्ति श्रीप्रकाश सिंह की एकल पीठ ने यह फैसला टीटीई विनोद कुमार गुप्ता की याचिका को मंजूर करके दिया। इसमें याची ने दुष्कर्म मामले में लखनऊ के अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत से 11 दिसंबर 2008 को सीआरपीसी की धारा 319 के तहत पारित तलबी आदेश पर रोक लगाने का आग्रह किया था। इस धारा के तहत किसी आपराधिक मामले में जांच या ट्रायल के दौरान किसी ऐसे व्यक्ति को भी तलब किया जा सकता है, जो एफआईआर या आगे की कार्यवाही में कभी आरोपी न रहा हो। याची का कहना था कि इस केस में उसके खिलाफ कोई मजबूत साक्ष्य न होने के बावजूद ट्रायल कोर्ट ने तलब किया। केस के दो अन्य अभियुक्त पहले ही वर्ष 2014 में बरी हो चुके हैं। याची ने कहा कि वह 57 साल का कैंसर की एडवांस स्टेज का मरीज है। ऐसे में, केस में उसकी तलबी निरस्त करने योग्य है। उधर, सरकारी वकील ने तलबी आदेश को उचित कहते हुए याचिका का विरोध किया। कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत किसी की तलबी के लिए काफी मजबूत साक्ष्य होना जरूरी है। अपराध में संलिप्तता की संभावना के आधार पर किसी को तलब नहीं किया जा सकता है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने 11 दिसंबर 2008 के तलबी आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही राज्य बनाम श्रीमती आशा उर्फ संजना व अन्य नामक केस के सत्र परीक्षण की आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।