आखिर गड़बड़झाला कहां है? व्यक्तियों में, उनके चयन में या सिस्टम में? ये सवाल सरकार में ही नहीं, बाहर रहने वालों के दिमागों में भी कौंध रहे हैं।
ताजा मामले देखिए। गृह विभाग राम मंदिर पुनर्निर्माण की बात कर रहा है, बाकायदा चिट्ठी जारी कर रहा है। मामला खुला, तो काम के बोझ जैसे बचकाने बहाने।
फोर्स के मुखिया कह रहे हैं कि दंगे तो अंग्रेजों की देन हैं...फूट डालो-राज करो की नीति (सही अल्फाज-अनीति) अब भी जारी है।
भाई, यही तो राहुल बाबा समेत सभी विपक्षी कह रहे हैं। उनके मातहत कह रहे हैं, दंगे रोकने की गारंटी तो कोई नहीं ले सकता।
ऐसी घटनाएं आखिर क्या जाहिर करती हैं? सरकार आप पर नाहक भरोसा कर रही है? कहते हैं न, बोलना सीखने में चार-पांच साल लगते हैं, क्या नहीं बोलना है, यह सीखने में जिंदगी लग जाती है।