अपने को बेहद काबिल मानने वाले एक प्रमुख सचिव आजकल हताश और निराश हैं।
उनकी मुश्किल ये है कि सरकार उनकी काबिलियत को समझ नहीं पा रही है।
जहां तैनात किए गए हैं, वहां उनको मजा नहीं आ रहा है। वैसे उनके पास जनता के हितों की सुरक्षा की निगरानी का जिम्मा है।
देखा जाए तो अपनी काबिलियत का लोहा मनवाने के लिए उनके पास अपार मौके हैं लेकिन महाशय का मन ही नहीं लग रहा है।
न विभाग में खास बजट है, न ही स्टाफ। और तो और दूसरों की गलती की तोहमत भी झेलनी पड़ती है।
इसी फ्रस्ट्रेशन में उनका गुस्सा अक्सर मातहतों पर फूट पड़ता है।
अपने दिए निर्देश व कही बातें खुद ही झुठलाने लगे हैं। अब इस मुश्किल में पिस रहा है स्टाफ। पर करें क्या, हाकिम जो ठहरे।