भगवा दल के सूबे के मुखिया अपने डॉक्टर साहब का जवाब नहीं। पार्टी वाले तो क्या, प्रतिद्वंद्वी भी उनका लोहा मानने लगे हैं।
सरकार पर हमला बोलना हो तो सबसे आगे। दौरा करना हो तो भी सबसे आगे। दिन में लखनऊ में तो रात में मेरठ और फिर अगले दिन वाराणसी।
चुनाव आयोग से मिलना हो तो वाजपेयी, सड़क पर धरना देना हो तो वाजपेयी। हद तो यह हो गई कि लगभग चौथाई सैकड़ा पदाधिकारियों की टोली में नियंत्रण कक्ष संभालने वाला भी कोई जिम्मेदार पदाधिकारी नहीं मिला।
तभी तो वाजपेयी जी को इस कक्ष के लिए अपना और अपने सहयोगी का ही नंबर देना पड़ा।