गोंडा। स्वास्थ्य विभाग में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत संचालित वाहनों को कागजों पर ही दौड़ा कर जिम्मेदारों ने 2.21 करोड़ की धनराशि खर्च कर डाली। महालेखा परीक्षक (एजी) की ऑडिट रिपोर्ट में सामने आए इस खेल के बाद इस योजना से जुड़े अफसरों में हड़कंप है। ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया कि जिम्मेदारों ने बिना जीपीएस प्रति के भुगतान करने, एसयूवी की जगह छोटी व पुरानी गाड़ियों का इस्तेमाल करने व पांच सालों तक बिना टेंडर कराए ही एक ही फर्म को वाहन सप्लाई का काम देकर सरकारी धन की जमकर बंदरबांट की।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत स्कूलों व आंगनबाड़ी केंद्रों पर जाकर बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण के लिए स्वास्थ्य टीमों को एक एक वाहन देने का प्रावधान है। इसके लिए जिले में 30 व्यवसायिक वाहनों (ईंधन व ड्राइवर सहित) लेने के लिए निविदा हुई थी। 7 नवंबर 2017 को मेसर्स मारुति नंदन इंटर प्राइजेज एंड जनरल आर्डर सप्लायर्स से 30 वाहनों को चलाने का अनुबंध 32,960 रुपया मासिक किराया राशि पर हुआ। अनुबंध की शर्तों के अनुसार प्रत्येक वाहन में जीपीएस सिस्टम होने के साथ ही सिर्फ एसयूवी वाहन ही प्रयोग में लाया जाना था। ताकि वाहन में ड्राइवर के अलावा चार अन्य लोग आसानी से बैठ सकें। वाहन पांच वर्ष से अधिक पुराना न होने तथा सबका टैक्सी परमिट होना भी उपयोग में लाए जाने की जरूरी शर्तों में शामिल था।
अभिलेखों की जांच के बाद तैयार हुई ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया है कि सेवा प्रदाता फर्म की ओर से बड़े वाहन के टेंडर में 16 छोटे वाहन को लगाया गया। इसमें से 18 वाहन पांच साल से पुराने व अनफिट मिले। यह भी पता चला कि किसी भी वाहन में जीपीएस सिस्टम नहीं लगा था। जिम्मेदारों ने सप्लायर फर्म को बिना जीपीएस प्रति के ही बिल वाउचर का भुगतान भी कर दिया। स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार ऑडिट टीम को तरबगंज, बेलसर तथा मुजेहना सीएचसी में प्रयोग आए वाहनों की लॉगबुक भी नहीं दिखा सके। इसके आधार पर ही महालेखा परीक्षक टीम ने तैयार की अपनी रिपोर्ट में आरबीएसके वाहन मद में 2.21 करोड़ का अनियमित भुगतान होने की बात कही है। इसके लिए सीएमएओ की जवाबदेही मानते हुए उनसे जवाब भी मांगा गया है।
बिना टेंडर के ही चल रहा था अनुबंध
अफसरों व बाबुओं की मिलीभगत से पांच सालों तक बिना टेंडर के ही एक ही फर्म के वाहनों को प्रयोग में लाने का अनुबंध विस्तारित होता रहा। सात नवंबर 2017 को टेंडर के अनुसार 26 वाहनों का अनुबंध 32500 रुपये प्रति माह की किराया दर पर मेसर्स मारुति नंदन इंटर प्राइजेज एंड जनरल आर्डर सप्लायर्स से हुआ था। बाद में नियम कानून दर किनार कर इसका विस्तार पहले नवंबर 2019 और इसके बाद 2021 तक बढ़ा दिया गया। चहेती फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए अधिकारियों ने 12 नवंबर 2021 को प्रयोग में लाए जाने वाले वाहनों के लिए फिर से निविदा निकाली और पुरानी फर्म मेसर्स मारुति नंदन इंटर प्राइजेज एंड जनरल आर्डर सप्लायर्स को ही मात्र 460 रुपया बढ़ाकर 32,960 रुपया प्रति माह किराया दर के साथ नए सिरे से अनुबंधित दिखा दिया। ऑडिट टीम ने माना कि विभाग की ओर से ठेकेदारों को वाहन अनुबंध में अनुचित लाभ देने के लिए बगैर टेंडर कराए ही कई बार अनुबंध विस्तार किया गया।
अमर उजाला ने मार्च में किया था खुलासा
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम में बिना जीपीएस लगे वाहनों के सहारे भुगतान में चल रहे खेल का खुलासा अमर उजाला ने 24 मार्च को प्रकाशित ‘कागजों पर दौड़ रहीं 20 गाड़ियां, हर माह 6.5 लाख की चपत’ शीर्षक से छपी खबर के साथ किया था। बाद में स्वास्थ्य विभाग के अपर निदेशक डॉक्टर अनिल मिश्र ने भी 22 अगस्त को किए गए निरीक्षण में एसयूवी की जगह छोटे वाहनों का संचालन मौके से पकड़ा था।
पिछले वित्तीय वर्ष की ऑडिट हुई है, उसकी रिपोर्ट अभी प्राप्त नहीं हुई है। लेखा विभाग से होकर ही ऑडिट रिपोर्ट विभागीय कार्यालय में आती है। भुगतान में अनियमितता मिलने पर संबंधित जिम्मेदारों को चिह्नित कर कार्रवाई के घेरे में लाया जाएगा। डॉ. रश्मि वर्मा, सीएमओ