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मेरे किरदार से कहीं बड़ा सैम सर का कद : विक्की कौशल

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लखनऊ। यदि कोई कहता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता तो, या तो वो झूठ बोल रहा या फिर वो गोरखा है…, सैम मानेकशॉ की कही कुछ ऐसी ही बातों को कोट करते हुए हर सवाल का जवाब देते जा रहे थे विक्की कौशल। जब-जब वे सैम सर का नाम दोहराते, पहले से ज्यादा विनम्र होते जाते। कहते हैं कि मेरे किरदार से कहीं बड़ा है सैम सर का कद।
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एक दिसंबर से सिनेमाघरों में रिलीज हो रही फिल्म सैम बहादुर 1971 की जंग के हीरो सैम मानेकशॉ के व्यक्तित्व पर आधारित है। फिल्म के प्रचार के लिए लखनऊ आए विक्की अमर उजाला कार्यालय भी पहुंचे और फिल्म से जुड़ी कई बातें साझा कीं। कहा कि आर्मी की वर्दी पहनने के बाद जिम्मेदारी बढ़ जाती है। हालांकि ये एक कलाकार के लिए सिर्फ कास्ट्यूम होता है, लेकिन हमारी भावनाएं, संवेदनाएं इससे जुड़ी होती हैं। इस फिल्म में मैं खुद पर ऐसी ही जिम्मेदारी महसूस कर रहा था।



शोध किया और करता ही रहा

बात जब सैम बहादुर के किरदार में खुद को ढालने की आई तो उन्होंने कहता कि उड़ी में हमने चार महीने का शारीरिक प्रशिक्षण लिया था। इसमें एकदम अलग बात है। यहां सैम सर को समझने के लिए शोध करना पड़ा, इतिहास को पढ़ा, परिवार से मिला, उनके इंटरव्यू को सुना। इंटरव्यू तब के हैं, जब वे 70 की उम्र पार कर चुके थे। उसे देख-सुनकर कल्पना की, परिवार के साथ बैठे, बातें की, किताबें पढ़ीं और कई कार्यशालाएं कीं। सैम सर की खासियत थी कि बेबाक बोलते थे, पर ऐसे कि किसी को बुरा भी न लगे।
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आगे बढ़ना है तो भूमिकाएं बदलनी होगी

अलग-अलग फिल्मों में अलग किरदार को लेकर जब सवाल सामने रखा गया तो विक्की ने कहा कि यदि आगे बढ़ना हो तो भूमिकाओं में एकरूपता को छोड़ना होगा। मैं वही कर रहा हूं। इस फिल्म को करने के फैसले की बात करूं तो मैंने जब स्क्रिप्ट को पढ़ा तो सैम सर को जाना, जब जाना तो छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता। यह फिल्म भारतीय सेना और पहले फील्ड मार्शल को समर्पित है जो बताती है कि उस शख्सियत से हम क्या सीख सकते हैं। यदि आज के युवा पांच फीसदी भी उनके व्यक्तित्व से सीख सकें तो हमारे समाज का चेहरा बदल जाएगा।
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