मोदी की महारैली खत्म होने के साथ ही कई भाजपाइयों को पसीना आने लगा है।
पांच महीने तो खुशी-खुशी कट गए लेकिन आगे क्या होगा। अभी तक तो कभी रैली के
मंच के नाम पर तो कभी मैदान का मैनेजमेंट संभालने के नाम पर अगुवाई करने
का मौका मिलता रहा।
जैसे-तैसे बडे़ नेता का रुतबा भी बरकरार रहा, पर अब तो
कसौटी उनका काम होगा। पोल खुल गई तो रुतबा ही गड़बड़ा जाएगा। बेचारे! करें
तो क्या करें।
इस जुगाड़ में लग गए हैं कि चुनाव के नाम पर कुछ नया काम मिल
जाए, जिससे आगे यह बहाना रहे कि वे तो इस काम में लगे थे। क्षेत्र कैसे
संभालते।