अवध की जंग में मोर्चा संभालने वाले अधिकतर सेनापति तो इस बार बदले हुए हैं, लेकिन मुद्दे वही हैं जो दो दशक पहले भी चुनावी जंग का हिस्सा हुआ करते थे। किसी पार्टी का कोई प्रत्याशी हो या सियासी दलों को संभालने वाले सूरमा, सभी ध्रुवीकरण की पतवार से चुनावी नैया पार लगाने की कोशिश कर रहे हैं।
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यह बात दीगर है कि ध्रुवीकरण के लिए राम जन्मभूमि या बाबरी मस्जिद की जगह दूसरे मुद्दों का सहारा लिया जा रहा है। गोंडा में सभा के लिए पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह नकल को मुद्दा बनाया और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अयोध्या की अनदेखी को लेकर भाजपा को घेरा, उसके पीछे भी वोटों की लामबंदी की कोशिश ही है।
बीते पांच साल में बहराइच से सिद्धार्थनगर तक की नेपाल से लगी सीमा से सटी इस जमीन पर कुछ सड़कें, स्कूल व पुल भले ही बन गए हों, केंद्र और प्रदेश सरकार ने यातायात से लेकर स्वास्थ्य तक के कुछ कामों का शिलान्यास कर दिया हो, निजी क्षेत्र में स्कूलों की संख्या में दिन दूनी-रात चौगुनी गति से इजाफा हुआ हो, लेकिन स्वास्थ्य, विकास और रोजगार की दुश्वारियों में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है।
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बाढ़ की त्रासदी इस जमीन के ज्यादातर इलाके के बाशिंदों की जिंदगी का हिस्सा बन गई है, पर सियासी सूरमा ध्रुवीकरण और जातियों की गोलबंदी को ही मुख्य हथियार बनाए ह़ुए हैं।
पहले ये थे चेहरे तो अब हैं ये लोग
लालकृष्ण आडवाणी
- फोटो : file photo
पांचवे चरण की जिन सीटों पर 27 फरवरी को चुनाव होने हैं, वहां पिछले चुनाव से अलग-अलग भगवा मुद्दो को धार दी गई थी। लालकृष्ण आडवाणी व विनय कटियार जैसे दिग्गज चेहरे भाजपा के प्रचार का अहम हिस्सा हुआ करते थे।
नेपाल से लगी सीमा पर मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या को देखते हुए अशोक सिंघल और प्रवीण भाई तोगड़िया भी ध्रुवीकरण के सहारे भाजपा के लिए लामबंदी करते थे। अयोध्या के तमाम-साधु व संत भी अलग-अलग तरीके से भाजपा के लिए जमीन तैयार करने की कोशिश करते थे।
भाजपा की तरफ से अयोध्या के सहारे जहां हिंदुओं के ध्रुवीकरण की कोशिश होती थी तो सपा के तत्कालीन मुखिया मुलायम सिंह यादव भी इन स्थितियों का लाभ उठाने के लिए इस इलाके में कई सभाएं किया करते थे।
कई सीटों पर यादव व अन्य पिछड़ों की लामबंदी कर वोटो की गणित को दुरुस्त करने कोशिश दिखाई देती थी। इस बार पूरा मोर्चा मुलायम के बेटे अखिलेश ने संभाल रखा है। आजम भी इसमें मदद कर रहे हैं। सिंहल तो हैं ही नहीं, पर तोगड़िया उस समय भी सियासी रण से दूर दिखाई दे रहे हैं जब चुनावी संग्राम अयोध्या और आसपास की धरती पर पहुंच गया है।
पर, इस काम को अलग-अलग तरीके से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय व प्रदेश अध्यक्ष, आदित्यनाथ जैसे चेहरे पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं। बसपा में चूंकि मायावती ही सर्वेसर्वा हैं इसलिए वे जाटव मतदाताओं के साथ मुस्लिम वोटरों की गोलबंदी में जुटी हैं।
मोदी ने किया 'गधा' व 'केसरियो होली' का प्रयोग
मोदी ने भले ही बहराइच, बस्ती और गोंडा में प्ररमजान व दिवाली में बराबर बिजली या कब्रिस्तान व श्मशान दोनों पर सरकार के बराबर ध्यान जैसे मुद्दे न उठाए हों लेकिन गधा शब्द पर पलटवार और 11 मार्च को केसरिया होली जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर वोटों की लामबंदी की ही कोशिश की है।
मोदी ने गोंडा में सूबे में नकल से गरीब परिवारों के बच्चों के बरबाद होते भविष्य को और किसानों की बदहाली को मुद्दा बनाने के लिए नकल माफिया व गन्ना माफिया पर वार किया तो यह अकारण नहीं है।
दरअसल, जिस जमीन पर मोदी बोल रहे थे उस जमीन पर निजी स्कूलों के प्रबंधकों द्वारा छात्रों व अभिभावकों का शोषण लोगों के दिल व दिमाग को काफी दिनों से कचोटता रहा है। जाहिर है कि मोदी के इस मुद्दे को उठाने के पीछे लोगों को यह संदेश देने की कोशिश ही दिखाई देती है कि भाजपा उन्हें इस शोषण से मुक्ति दिलाना चाहती है।
इसी तरह उन्होंने गन्ना की चोरी और घटतौली जैसे शब्द का इस्तेमाल करके गन्ना उपजाने वाली इस बेल्ट के किसानों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे इनकी समस्याओं से सरोकार रखते हैं।
अखिलेश ने छोड़ा पर आजम लगातार दे रहे मुद्दे को धार
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव
- फोटो : amar ujala
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गधे वाली टिप्पणी से यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया हो कि उन्होंने यह बात मजाक में कही थी, लेकिन आजम खां इस मुद्दे को लगातार तूल दे रहे हैं।
कारण संभवत: यही है कि उन्हें लगता है कि मोदी पर हमला करने से इस जमीन पर बसने वाली मुस्लिम आबादी सपा के पक्ष में लामबंद हो सकती है। तभी तो उन्होंने बहराइच में कहा, ‘गुजरात में गधों की कमी नहीं है।’
महंत आदित्यनाथ भी शायद यह जानते हैं कि आजम पर हमला बोलने से हिंदुओं की लामबंदी हो सकती है। उन्होंने श्रावस्ती की सभा में बोला कि सरकार बनी तो आजम जैसे लोग सूबे से बाहर चले जाएंगे।
अखिलेश यादव ने फैजाबाद में भाजपा पर हमला बोला कि अयोध्या जपते हैं लेकिन विकास नहीं करते। राहुल गांधी भी पीछे नहीं रहे।
उन्होंने बलरामपुर में यह कहकर कि चूहे से भी कमजोर हैं पीएम, सपा व कॉंग्रेस गठबंधन के पक्ष में वोटों की लामबंदी की कोशिश की।
आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादे मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदउद्दीन ओवैसी भी जंग वाली इस जमीन पर सक्रिय हैं। उनके निशाने पर सपा और भाजपा दोनों है। मायावती भी बहराइच व गोंडा जाकर यह कहते हुए कि सपा व कॉंग्रेस गठबंधन कमजोर है।
मुसलमान अगर इन्हें वोट देते हैं तो भाजपा मजबूत होगी, इस इलाके के मुस्लिम वोटों की लामबंदी की कोशिश कर आई है। साफ है कि राम मंदिर न सही लेकिन नए-नए तरीके से वोटों के ध्रुवीकरण व लामबंदी की कोशिश हो रही है।