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सुना है क्या: 'गुरु की राह पर चेला'; साथ ही 'दोस्त-दोस्त न रहा और निर्माण एजेंसी पर मेहरबानी' के किस्से

Mon, 10 Aug 2026 09:50 AM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'गुरु की राह पर पर चेला' की कहानी। इसके अलावा 'दोस्त-दोस्त न रहा' और 'निर्माण एजेंसी पर यूं ही नहीं हैं मेहरबान' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

गुरु की राह पर चेला

काशी में इन दिनों दो मामलों की खूब चर्चा हो रही है। एक तो सावन की वजह से धार्मिक माहौल की और दूसरा एक माननीय के चेले की करतूत की। दरअसल ये चेला उन्हीं माननीय के जिगर का टुकड़ा है, जिन्होंने कभी टिकट पाने के लिए संगठन के एक पदाधिकारी को मैनेज करने के लिए यही तरीका अपनाया था और खूब सूर्खियां बटोरी थीं। अब चेला भी उसी राह पर है। हाल में बाइक पर महिला के साथ चेले का वीडियो वायरल हुआ है। इसमें चेला एक महिला के साथ खुलेआम सड़क पर प्रेमालाप करते हुए दिख रहा है। चूंकि चेला भी माननीय के आर्शीवाद से निकाय स्तर का जनप्रतिनिधि बन गया है, इसलिए उसकी ये हरकत खूब चर्चा में है।

दोस्त-दोस्त न रहा

एक ब्यूरोक्रेट लोकप्रिय जनप्रतिनिधि के बड़े गहरे दोस्त थे। एक एजेंसी के एक्शन में उनकी दोस्ती के तमाम किस्सों और लेन-देन का खुलासा भी हुआ। तब भी वह नहीं डिगे और दोस्ती पर भी कोई आंच नहीं आने दी। लेकिन जनप्रतिनिधि के गुजर जाने के बाद उनकी गैरमौजूदगी ने कईयों को सोचने को मजबूर कर दिया कि आखिर बीच में ऐसी क्या खटास हुई कि मातमपुर्सी भी जरूरी नहीं समझी। सुना है कि एजेंसी से दिल्ली ने सारे सुबूत मांग लिए हैं। भला बिन बुलाए अब मुसीबत कौन मोल ले, इसलिए दूरी ही ठीक है। पता नहीं नौकरी समाप्त होते ही कौन सी जांच शुरू हो जाए।

निर्माण एजेंसी पर यूं ही नहीं हैं मेहरबान

एक निर्माण एजेंसी के काम में जबरदस्त ढिलाई है। बरसों बरस से लोक महत्व की परियोजनाएं लंबित हैं। यह स्थिति तब है, जब पर्याप्त राशि काफी पहले जारी हो चुकी है। निर्माण एजेंसी पर ऊपर वाले इतने मेहरबान हैं कि किसी और को काम न देने का नियम ही बना दिया है। यह मेहरबानी यूं ही नहीं है। भेदिये बताते हैं कि निर्माण एजेंसी उसकी कारस्तानियों की तरफ आंखें मूंदने के लिए प्रति माह 85 लाख रुपये का चढ़ावा चढ़ा रही है। शेष आप खुद ही समझदार हैं....।

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