मजबूरी के साथ जीना नहीं आता। मुझे किसी से कोई गिला-शिकवा नहीं है और जानता हूं आप सभी मुझे बहुत चाहते हैं और मैं आपको बहुत प्यार करता हूं।
मगर स्वास्थ्य खराब होने के कारण न किसी से मिल पाता हूं, यहां तक कि फोन भी अक्सर रिसीव नहीं कर पाता। बहुत कमजोर हो गया हूं। कभी जीवन में ऐसी जिंदगी की कल्पना नहीं की थी।
एक-दो दिन या महीने की बात होती तो किसी तरह जी लेता। लेकिन रोज-रोज मर के जीने के बजाए एक बार मर जाना उचित समझता हूं। कोई गलती हुई किसी के प्रति तो माफी चाहता हूं।
मेरे परिवार के लोग आपस में सामंजस्य बना कर रहिएगा और मेरे बेटों को उनकी मां, बुआ, दादी पढ़ाने पर जरूर ध्यान दीजिएगा। अपनी तकदीर से अब लड़ नहीं पा रहा हूं। प्लीज कोई मेरे मरने पर उदास नहीं होइएगा। जो आया है, सभी को जाना पड़ता है।
अपने दोस्तों से उम्मीद करता हूं कि मेरी परिस्थितियों को समझकर मेरे परिवार का ढांढस बढ़ाइएगा और उनकी आंखों में आंसू मत आने दीजिएगा।
आत्महत्या कायर लोग करते हैं और हो सकता है कि यह सही हो, लेकिन अब और नहीं लड़ा जा रहा है। बहुत जगह इलाज कराया, लेकिन कोई सुधार नहीं होता दिख रहा है और मजबूरी के साथ मुझे जीना नहीं आता।
आप सभी का अपना विकास वर्मा